एक ही चित पावनी, राधा है वो।
भाव: जन्म के साथ मानव शरीर में हमारी चेतना राधा रूप बन अंतस में उतरती है, जिससे जीव भाव और मैं पन आता है। यह श्रीकृष्ण पद से आती है और सम्पूर्ण जीवन उसी की तलाश में लगी रहती है। जब जब उनके ध्यान में रहती है इसे विशिष्ट सुख शांति अनुभव होती है। इन अनंत का ध्यान, अवगाहन, पूजन, उसी में आत्म का समर्पण अपनी संस्कृति का मुख्य अंग रहा है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
एक ही राधा है री!
जो धार बनकर उतरती है..
उभरती... है
जेहन में, हर जीव के
बार... पहली,
श्रीकृष्ण.. के, श्री.. चरण रज़.. से।
हर जीव.. में, हर इंद्रियों.. को
जोड़ती.. यह,
चेतना से, अनुभूति.. से,
व्यवहार.. से
इस अखिल जग में।
चेतना का रूप ले,
काया में सबकी,
बिहरती है, प्रेम करती है,
मनों.. में, हर एक मन से।
आज तक.. मैं जानता हूँ,
दूसरी.. कोई, नहीं है
जोड़ दे,
तन, मिट्टियों का, चेतना से
श्रीकृष्ण के बृजधाम से..।
तूं समझ इसको,
मान इसको, प्यार कर
इस राधिका से,
चेतना..., तेरी ही.. हैं.., ये
तेरे साथ ही रहती हमेशा
निर्देश करती, रास्तों का,
मार्गों का, सदा रे !
श्री कृष्ण पद, पाती है जो।
दूसरी... वह कौन है?
जो उतरती हो, अकेले रे!
ऊंचे वहां, बृजधाम से
एक ही चित पावनी है,
एक ही चित पावनी, राधा है वो।
पग दो:
एक खेल थी ये जिंदगी!
इससे अधिक.. कहां?
रास्ते हजार.. थे
इसमें.. गलत कहां?
भाव: परिणय के पूर्व, पति पत्नी दोनों के लिए हजारों संभावनाएं होती हैं, और उस समय जीवन खेल सा ही लगता है। हमें विवाह बाद जीवन की सच्चाई सामने आती है।
तुम.. मिल गए मुझे यहां
ये बात और... है,
मै जी रही थी, जिंदगी
खुशहाल! ही यहां।
भाव: यद्यपि विवाह पूर्व का जीवन सच जीवन का सबसे अच्छा समय होता है फिर भी एक स्थायित्व की तलाश हमे परिणय तक ले जाती है।
तुम ज्वार हो!
मैग्मा* हो!
तप्त.., कितने हो!
मैं जल चुकी हूं! हृदय तक..
आगे... जलूं कहां।
भाव: विवाह बाद आज जो स्थिति देखता हूँ कुछ लोगों के लिए आग में जलने से भी बदतर है। जीवन आपसी तनाव से नर्क बन जाता है। जीवन मरण की स्थिति आ जाती है।
कैसे जिऊं.. मैं साथ तेरे..
ये.. जिंदगी बची?
इस द्वंद मै डूबती,
दोराहे... हूं खड़ी।
भाव: अंत क्या होगा? कैसे इस तनाव में जीवन हंसेगा कभी यह कठिन प्रश्न हैं। फिर एक दोराहा आता है की दोनों के दो रास्ते हो जाएं और परिणय विच्छेद संभावित है।
क्या करूं! मैं सोचकर,
भीतर ही घुट रही,
जाना, मुझे था पार, खुद के
किस द्वंद में फंसी..
जो जिंदगी, मैं.. खोजती,
खुश.. होती थी सदा..
यही थी... जिंदगी..,मेरी
यही थी जिंदगी।
भाव: हारा हुआ आदमी आखिर में अपनी समीक्षा करता है, अपने निर्णयों पर पछताता है और सोचता है क्या यही जिंदगी थी। क्योंकि उसके सामने उसकी जिंदगी कुछ अलग हो सामने एक प्रतिबिंब से नजर आती है।
पग: तीन
बरसता हो, अगर लहरा..
प्यार.. का,
रास्तों पर.. कहीं.. कोई
तुम, भीगना.. मत!
पर! खडे होकर, मुस्कुराना..,
देखना, सम्हाल रखना,
रेशों को चुनना
पास रखना,
अलविदा करने से पहले
सौ बार उसको सोचना।
बादल... सभी ये
एक से.. हैं,
उपजते हैं, दीखते हैं, निकलते है
हृदय से, मानव मनों में...
पानी... वही तो एक है,
खारा! समंदर का लिए सब घूमते हैं,
बेशक! कई ये दीखते हैं!
कुछ नहीं है,
वह... प्यार ही है,
घेर कर तुझको खड़ा है
पर ध्यान रखना,
तन समर्पण, मन समर्पण
एक बार ही होता
यहां पर,
याद रखना, भूलना मत!
तब लिपटना,
चाहे जैसे..
आंखे मूंदे! तुम फिर किसी से।
वह प्यार ही है,
घेर कर तुझको खड़ा है, सामने जो।
जय प्रकाश मिश्र
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