वो कौन था, रहता यहां पर

आज का दर्द: जीवन नदी सा बहाव ही है, वर्षा काल के यौवन में हहकारता, दबोचता, किनारे तोड़ता, चुनौती देता, भयावह होता, दौड़ता भागता रहता है। जीवन की ग्रीष्म में सूखी नदी सा वृद्ध हो अन्यान्य बीमारियों से लाइलाज, हांफता, रुकता, करुण पुकार करता आगे बढ़ता है। सभी इससे गुजरते ही हैं। जीवन की, इस दुर्दमनीय अवस्था को मैने बहुत पास से देखा है। आप के लिए शब्दों में पिरोया है आप पढ़ें और आनंद लें। 

वो 
कौन था, 
रहता यहां था,
इतने दिनों... तक, 
गुलज़ार थी, ये जगह कैसी! 
उसके ही दम पर! 

यह बोलती थी, 
अरे यह!  
कैसी मुखर थी, 
आबाद थी, किस तरह,
रंग.. कैसे घोलती, 
छतनार.. थी।
शीतल.. बहुत थी, 
आबरू-ए-चमन की, आधार थी, 
आधार थी यह.., हम सभी की।

उड़ गए पंछी न जाने 
अरे! कितने...
घोंसला अपना बनाए 
इसके.. दम पर, 
यह शख्सियत थी, 
उस दौर की, दौरेजहां.. की, 
मैं, 
जानता... हूँ, 
इतने... दिनों से..., अच्छी तरह ।

कुछ कह रही, दीवार यह, 
उत्सुक है क्या..? 
संदेश... उसका... 
मौन... में ही, मुझे.. देगी..।

सोचता हूँ, 
यह, वही... है?  
नेपथ्य में बैठा हुआ, 
पर्दे के पीछे.. हांफता
सोच में डूबा हुआ, 
कुछ.. बुदबुदाता
जाने.. किससे.. 
बहुत धीमे.. मंद स्वर, 
लाचार.. सा!  

यह.. निबल, 
दुबला, 
पड़ा यूं, एकांत में.., 
चुप चुप अंधेरे! 
अरे! इसको पास आ
जरा, देख... तो! 
अकेले, 
वीरान... में, 
कैसे पड़ा है, लग रहा, 
शमशान में कोई खड़ा है।

कुछ कर रहा है, 
नहीं तो! 
शिकायत है, किसी से...
अपनों.. से है, या.. 
किसी गैर.. से
पूछता.. हूँ! 
खुद से मैं.., उसे.. देखता... हूं! 
सच! गिर गए है,
निष्ठुर ही थे, गात के हर
पात कैसे! 
झर गए हैं, असमय ही 
इस  पेड़ से
भूमि पर, 
हो पीले पीले
रसीले थे, अभी पहले
क्या करे यह...
वश नहीं अपने पे इसका, 
दुनियां को वश में क्या करे।


भूमि ही क्यों, 
ठिकाना बदला नहीं है,
विवश हो, मै देखता हूं
आदमी, क्या समय से हारा हुआ है! 
सत्य है, संसार यदि तो, 
इस तरह..
अरे! इतने जल्दी,
झपकते इस पलक के,
क्यूं बदलता! इस तरह है!

कमजोर है यह आदमी, 
कमजोर इसकी
भुजाएं हैं,
कमजोर इसकी स्मृति, मानस पटल है
कमजोर इसकी, बुद्धि है, पराक्रम है।
समय से हारा हुआ यह आदमी है
देखा है मैने पास से, सच कह रहा हूं।

जय प्रकाश मिश्र 



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