उनके लिए मैं रो रहा हूँ।
परि परिचय: आपके लिए जीवन की धूप छैयां को व्यंग में ढाल थोड़े शब्दों में समेटा है, बहुत सावधान आदमी जीवन में, जीवन से, दूर ही रह जाता है और उसकी सालों की अवधि, लम्हों में गुजर जाती है। जिंदगी हवाओं सी फिसल जाती है।
धूप थी, कड़ी थी,
और उमस भी तो, अधिक.. थी,
खेलते... बच्चे वहीं, अंजान थे
इन सभी... से,
कुछ बड़े थे...
"लोग",
शिकायत... उनको, बहुत थी..
इस बार सी "उमस-गर्मी"
किसी ने देखी नहीं थी।
मस्त बच्चे, दौड़ते, हल्ला मचाते, कूदते
खेलते, फुटबॉल, किकेट
झगड़ते, कुछ पिनकते..
लूटते, अरे! मजे थे, वे समझ तो,
अनभिज्ञ थे
हालात से, दुनियां के इस..
बौउझार से,
समस्या.. से, हम.. दुखी थे,
सच में, खुद
के.. स्वास्थ्य... से, औलाद.. से,
पढ़ते नहीं थे,
स्थिति से, कंट्रोल से..
बाहर हुआ, सब जा रहा था,
महीनों से, साल से,
युद्ध से, जय पराजय से,
बारूद से,
मिसाइलों, राकेटों, बम धमाकों से।
क्या कहें इस जिंदगी को
ढूंढने में बीत गी...,
एक दिन की जिंदगी थी
लम्हों... ही में, बीत.. गी।
पग दो:
जिंदगी को चाहिए क्या
सीट.. कोई! हैंडल..!
पैडल कोई..!
अरी... ना रे...! यह दौड़ती...
मड.. गाड़ बिन..,
ब्रे..क, बिन..
पंचर हुए, उन टायरों पर,
शौक से...
रिम पर... भी सुन, ब्रिम पर भी सुन!
अपनी धुनों में।
उससे सुरीली, मान मेरी,
चल देख.. ले!
इस खड़ी गाड़ी में अभी...
जो खींचता... है, दम.. लगा के...
हाथ.. तुमसा
अरे कोई!
जिंदगी की राह पर...
जिंदगी की चाह भर...
तुमसे भी सुंदर,
देख! वो सुस्ता रहा है, बैठकर!
पेड़ के नीचे वहां, पसीने में भीग कर
नंगे बदन..।
क्या सोचता है तूं यहां, बैठा हुआ
इस झरोखे.. से,
जिन्दगी!..., यहां है?
बंद कमरे में, तुझी... सी
कमबख्त..!
मुझको माफ कर..
जिंदगी है, हवाओं में, सूखते
उन पसीनों.. में
पत्तियों.. में
जो हिल.. रही हैं, झुरकियों.. से
डालियों.. पर, गर्मियों.. में, उमस.. में..
समीर के संग झूलती.. है,
गोतों से आ... खुद देख ले!
पग तीन:
परेशान... है, यह "वक़्त",
सच! इस वक़्त...
यह मै, जानता हूँ, पर.. क्या करूं!
दास्तां.., किसकी लिखूं!
आंसू.. लिखूं जो बह रहे हैं,
सूख कर, नन्हों के मुख पर,
जम... गए हैं।
ख़ू.. लिखूं!
फैला हुआ है, जो.. धरा पर !
आदमी का, औरतों का,
नागरिक का, निर्दोष हैं जो,
बस नागरिक.., उस देश.. के,
दोष.. है, ये.. ।
आग की विकरालता, का
क्या करूं..
जल गए घर, जल गए तन,
जल गई..
उम्मीद सारी, अरे उनका क्या करूं!
कोई सुन रहा है, क्या यहां?
क्या हो रहा है?
जी रहा है आदमी, या मर रहा है।
दर्द की उस इंतहा, को पर.. लगा दूं!
रोते हुए बच्चों की सच्ची
तस्वीर.. को, और सुंदर..
बिलखती...
कागज.. पर बना दूं!
बेंच लूं, छाप दूं! मैं, वह! नहीं हूं।
सूजी हुई, धुंधली हुई, सूखी हुई
उन आंख को मैं...
यहीं बैठा देखता हूं, थक रहा हूं!
कल्पना में, नहीं रे!
सच!
मैं.. उनको
अपने अंदर भोगता हूं
अपने ही घर, बैठ कर, इस निविड में
क्या करूं! मैं तड़पता हूँ!
पर क्या करू!
दूर हूं, क्या तेरा नहीं हूँ..
सच कह रहा हूँ, मैं "आदमी" हूँ
तेरे लिए मैं "रो" रहा हूँ।
इस युद्ध में मारे गए, घायल हुए,
बेघर हुए, सभी के
बर्बादियों की दास्तां लिखते हुए
श्रद्धांजलि.. मै दे रहा हूँ
मैं, रो ..रहा हूं।
जय प्रकाश मिश्र
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