यशोदा.., खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे !

भाव: जानने वाले जानते हैं, अपने श्रीकान्हा और श्रीराधाजी में कभी द्वैत संभव ही नहीं, अद्वैत का इनसे सुंदर उदाहरण भी नहीं। नटखट नीलवर्ण श्याम और अनारदाने सी लालिम-स्वर्ण वर्णा राधा दोनों में झलक एक ही है। अनार के दाने पानी पाते ही नीलाभ हो जाते हैं और नीलकमल में गुलाबीपन किनारों से झांकता रहता है। इनका ऐक्य ऐसा ही है। आप इन लाइनों में यशोदा से कान्हा के उलाहना और उसी में भीतर छुपे प्रेम को अनुभव कर आनंद लें।

अरी! ओ.. यशोदा,

खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो, रे! 

कैसे कहूं, उन्ह.. चोर,  मैं.. रे..! 

अरि..! उन्हन... 

तौ... 

चोर... सौं, अति.. बावरो.. रे,

यशोदा.., 

खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे! 


नाम.. 

धरो.. है, 

कुंज... बिहारी..

झूलत... कुंजन में, पट डारी, 

राधा... संग, संखियन.. के,  

सुन री..! 

झूलत.., इत डारी.., उत... डारी,

कौतुक.. करत.., 

हेरि...!  सुन.. कईसो.., 

मन.. ललचत.. है, मेरो...

यशोदा.., 

खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे ! 


एक.. दिन, देखी..,

श्याम.. तेरो.. रे! बंशीवट की छइयां..

ग्वाल सखा, सब लई के.. 

बैठा...

जोहत!  मेरी.. रहियां 

कंकड़.. फेंकि, मटुकि, मोरि फोड़ी,

भीजी.. मोरी, अंगिया..., 

रस.. भीजत..  

मैं,  बाउरि... हुइ.. गी.., 

भूली अपनी रहियां। 

बिसरि गई सुधि बुधि, अलि! मोरी

अरी!  मैं..., 

डारी... संग उन्ह,  हीं.. गलबहियां,

यशोदा.., 

खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे ! 


कृष्ण.., केलि.. कस.. करत, 

सखी सुन! 

बांसुरि देत बजाई..

सुनत.. समीर, "मंद मद.. मानुष"

ठाढ़.. सुनत, बांसुरि को, 

नृत्यत.. राधा, 

पट.. नीचे... लटके.. 

उड़ि न सकें हैं, एको

राधा मन सकुचाई, खड़ी है 

पग नृत्य रुके, राधा के..,

विह्वल ग्वाल बाल सब हुई गे 

श्याम सुंदर पद टेके।

राधा नागरि, बांसुरि 

अरि.. जानी

श्याम अधर ते खींचो।

यशोदा.., 

खारो.. बहुत, तेरो... लाड़लो रे ! 


जय प्रकाश मिश्र



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