बहुत पूछा उनसे मैने, क्या था वो,
मैं चुक.., चुका हूं! जानता हूं
बात को इस...
इसलिए,
दे रहा हूं, राज... कुछ!
उत्कृष्टतम..
निज.. जिंदगी का।
रहस्य को उस,
सिर्फ तेरे ही लिए, मैं खोलता हूं..,
बैन है, यह
समाज में इस..,
जाने न कबसे.., बस इसलिए...
यह, व्यवस्था सब चल सके,
कर्म.. से, पैरों.. पे खुद..,
सतत.. आगे..,
और आगे.. बढ़ सके।
अलकापुरी...
एक.. स्वर्ण.. नगरी!
चमचम.. चमकती, मनोहर!
सब जानते हैं, कुबेर.. की।
पर कैसे बनी थी?
कैसे बनी थी, स्वर्ण... लंका?
स्वर्ण की,
यह, किस तरह संभव हुईं थी!
क्या कभी, सोचा!
किसी ने....
वह राज है, रहस्य है,
एक क्रिया है
जानकारी..., सच.. समझ है,
बस, उस समय,
उन सभी.. को, अच्छी तरह थी।
शायद, इसे कोई देख ले..
जो तीव्र हो,
बुद्धि से, सोच ले,
भाग्य बल से ही, वो... अपने
प्राप्त कर ले.
बिल्कुल वही..
जो उस समय था..
इस लिए, मैं.. लिख रहा हूं
कोइ पढ़.. ले, समझ.. ले,
पूर्ण.. कर ले,
टास्क.. को इस, जो स्वयं हल है,
आज की हर समस्या का।
उस स्वर्ण को,
भविष्य में वह, इन प्रक्रिया से
रच भी ले।
अब ध्यान से सुनना इसे!
यह कथा है,
अरे न! यह सत्य है!
कठिन है, पर रहस्य है,
संभव भी है?
अरे.. हां!
देखा है मैने, खुद सामने, होते इसे।
आस से मैं भी रहूंगा, तुम भी रहो,
अभी और आगे..
पर सत्य है यह,
यह सत्य, लो.. तुम भी सुनो..।
चल खोलता हूं, राज... पहला
साधु थे, एक..,
किनारे.. पर "गोमती" के,
संयमित, प्रमुदित, तपस्वी एकब्रत..
निवास करते, बिल्कुल अकेले..
एकांत में, इक झोपडी में,
कुछ नहीं था, पास.. उनके,
कुछ नहीं वह,
कभी लेते थे, किसी से।
पर संपन्न थे, वे
हर तरह..से, अन्न से,
हर चीज से, वासन वसन से।
हर एक ऋतु में, ही नहीं..,
हर.. दुर्दिनो में।
साथ उनके मैं रहा था,
बहुत दिन तक
इस लिए मैं जानता हूं!
बचपने के दिन
थे, मेरे..
एक राज है, चल बताता हूं..
खोलता हूं
आज उनका,
तुम सभी के सामने
मैं बोलता हूं!
मैं जानता था, वह साधु थे,
निष्कपट, निश्छल, कहूं
सच, बालकों से।
सादगी प्रिय, परम शीतल
पर जानते थे एक विद्या!
ताम्र को वह बदलते थे स्वर्ण में..।
बस जरूरत भर!
एक सिक्का, एक पैसा, ताम्र का
"छिदहवा.. डब्बल" उसे कहते थे सब..
चलता था तब..।
शेष बचता था, मात्र
जब जब अंत में
वह उसी को गर्म करते,
लाल करते,
अंगार सा, उसे बना देते।
रस छोड़ते थे,
गोमती जल में पिसा वह
आंवले की
पत्तियों का, और दो कुछ
बहुत लोकल, बहुत छोटी
पत्तियों का।
और फिर क्या,
स्वर्ण बन जाता वो सिक्का..
दमकता
बस एक क्षण में।
फिर खर्च करते आखिरी
उस मोड तक
जब एक पैसा, ताम्र का
अवशेष बचता, पास उनके..
फिर, बनाते स्वर्ण उसको आखिरी में।
खर्च करते, आखिरी तक।
बहुत पूछा उनसे मैने,
क्या था वो,
वो बोलते कुछ भी नहीं थे।
एक दिन कहने लगे, यह स्वर्ण है
जरूरत है, मात्र मेरी
इससे अलग यह कुछ नहीं है।
क्या करोगे इसे लेकर..,
क्या करोगे इसे लेकर..।
जय प्रकाश मिश्र
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