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Showing posts from January, 2026

श्री हरये कृष्णाय नमः

ईश्वर,अपनी ईश्वरीय प्रभा में ही विलीन रहते हैं, हम एक उन्जाला स्वरूप ही उन्हें देख पाते हैं। शेष अपनी अपनी आस्था, विश्वास, समर्पण, अर्पण का रूप होता है जो मस्तिष्क और मन उसमें ढूंढ लेता है, वही देखता च पाता भी है। इसी पर आज की पंक्तियां आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं। श्री हरये कृष्णाय नमः द्युति..!   दूर करो,  प्रभु....  दीखते.. नहीं हौ..! जतन करि  हारी...,  तुम! दीठते नहीं... हौ !  नयन.. मोरे, , ये.., चर्म चक्षु हैं साधन और...,  नहिन हैं.. द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हैं..! ज्योति, तुम्हारी,  परचम..!  परचम..! दिव्य! नवल- रस सिक्त मनोरम..! चंचल इतने,  क्षण में  कितने रूप... संवरते..,  टिकतय.. तौ. नहीं, हौ...  द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..! राम.., श्याम... तुम,  सांवर.. सांवर.. सांवर.. पर मैं,  हुई.. निछावर जब तक खोजूं, रूप.. सांवरा बदरा बन, बरसत हौ....  द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..! कोई कहत तुम,  रंग चंपई! राधा,  संग बिहरत हौ  पीताम्बर फहरत है, ऐसौ.. नजर नह...

प्रसन्न होकर, मैटनी शो देखना!

मित्रों, भारत विशाल देश और मर्यादित राष्ट्र है। इसकी फैब्रिक अटूट ताने बाने से बनी हैं। शिवत्व और देवत्व की समरसता उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम हर आत्म और कण कण में संव्याप्त है। पवन के थपेड़े इसे गति देते हैं। हम सभी एक भारतवासी हैं और कुछ नहीं। इसपर कुछ लाइने और आज के लोगो की जीवन शैली पर एक नजर भी प्रस्तुत है। आप पढ़ आनंद लें। गंगा यमुना का देश है यह काव्य हो या गजल हो सब वस्त्र इसके अंत... इसका, कभी न.. हो !   जेहन में, जिंदा.. रहे  प्रिय!  ख्वाब बन,  खिल..  मुस्कुराए  गजल.., यह,  मनों में,  हिलती, लिली... सी काव्य से, सट कर रहे।   लट बिखर   उड़ती,  हवाओं में मित्र  प्रिय इस,  गजल.. की मकरंद सी,  ह्रदय संग  मस्तिष्क छूए, शब्द में, यह उतरती  पांव तेरे,  लिपट कर...  मां भारती! की स्तुति करे। मां भारती! की स्तुति करे। एक संगम,  गंगा.. जमुनी..,  इस धरा पर,  दाहिनी भुज, बाम सी कायम रहे। सत्य है, हम साथ हैं,  हम साथ थे,  चिर दिनों से,  बहुरंग रंगी फूल, इक स...

गंगा हूं मैं, स्वर्ग मेरा धाम है।

मित्रों, धरती पर रहते हुए हमे कुछ चीजे स्वर्ग की भी देखने और छूने को मिल जाती हैं उनमें, मां गंगा प्रमुख हैं।  मां गंगा को समर्पित एक शब्द पुष्करिणी, आप भी आनंद लें। गंगा हूँ ..."मैं"  वह!! 'स्वर्ग' मेरा धाम है, निवासिनी मैं..,  वहीं की.. तो,  मूल हूँ!  हे.., मनुष्यों!  कामना जिसकी.. लिए तुम! भरमते हो,  धरा ऊपर, जिंदगी भर। इसलिए तो कह रही हूँ, दिन, कुछ बिता लो, साथ मेरे किनारों पर,  स्वर्ग सा अनुभव यहां है,  आओ मिलो, इन रज कणों से रजत से ये, अधिक सुंदर। मानती हूँ, आज भी.. तप! तुम्हारा था,  महाप्राणी... भगीरथ का,  महाप्रण.. था,  क्या करें, वो... सामना..!  भगवान... श्री.. कपिलमुनि के, श्राप.. से था। सगर के, उस.. राजकुल के  बालकों का, तरन  सिवा मेरे, कैसे भी नहीं था। एक!  मैं, ही मात्र!  थी, संसार में, इस..,  स्पर्श! जिसका उनके लिए, उस पाप! से,  मुक्ति में,  तब, वांछित था। सुखी थी मैं...  स्वर्ग में... आनंद लहरी, ले.. रही थी, बह रही थी, तरंगों पर  थिरकती उर्मियों में, उर ...

अनुभूति शिव की परम पाएं,

मित्रों, श्रीकपिल मुनि आश्रम, गंगासागर का विशिष्ट स्थान। जो आज भी दिगम्बर मानव मणियों से सज्जित है। इसी पर आज की पंक्तियां आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ आनंद पाएं, कामना है। श्री... कपिल..  मुनि का, आश्रम!  आज भी, जीवंत.. है,  ठीक वैसे.., तब था, जैसे!  छत्ता..!  है.., प्रिय!  मधुमक्खियों..का,  हर.. तरफ  "ताखों*.."   में..  बैठे...,  भभूत.. पोते,  शिव सरीखे मुक्त.. हो, संसार से, संसार.. को,  कुछ,  इस..तरह,  ईंट.., पाथर..,  मान बैठे!   हे....  मित्र..!  मेरे,  शीत में भी,  नग्न .. वैसे , लंगोटी से हीन!  ये तुच्छ!  सब कुछ, समझते..  इन..  संन्यासियों को देख.. आया, पास से,  निज आंख.. से झरोखों.. में,  मणि..  जड़े.. हों, दहकते,  इस तरह से ..  दीखते हैं,  सत्य है ये!  निरंजन!   की  अलख! लखते... लखाते... हैं, पास से नजदीक जाओ! पूछ लो...,  जो, कुछ.. भी चाहो... उपलब्ध हैं, ये...! विकट हैं,  रुक्ष हैं,  दिगम्बर...

एक होगा, नेक होगा, बदल देगा

मित्रों, गंगासागर में 'डुबकी' एक महासुख की अनुभूति! इसी गंगासागर पर आज की लाइने आप पढ़ें और आनंद लें।  कपिल मुनि का आश्रम और कपिल मुनि,  समय के, उस.. खड्ड में, गिर.. समा... जाते, जाने... न कबके.! साथ  ही,  वह द्वीप.. भी। काल कवलित  हो, गया..  होता  कभी का... दोष.. लेकर  भस्मिता का। निर्दोष उन, हजारों  सगर सुतों, का। पर, भला हो, भगीरथ का, भागीरथी का,  पुष्प..  कलिका सा, खिला है  आज भी,  यह  गंगा सागर, रात दिन,  निज नाम, से मेला लगाए,  भक्त जन का। स्नान पुण्यक...  मुक्ति.. का ठीक वैसे, चल रहा है  आज भी सदियों से मित्रों! चल रहा था भव्य जैसें। वह, सगर थे, महा.. पुण्यज, महीपति.. थे,  उस.. समय के,  सागर थे बच्चे, षष्टदश सहस्त्र थे वे,  जो.. "राजसूयक-यज्ञ के उस अश्व" पीछे चले.. आए  खोजते.., खोजते... कपिल मुनि, आश्रम के नीचे!   इंद्र के, करतब से, मित्रों दुष्टता से।  लालसा  यह, सतत सुख की  पाप! है कर्म को ले डूबती है साथ अपने, अंत में, देखें न कैसे?  दोष द...

एक खुशबू है गजल!

आप सभी मित्रों को पुण्य गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। आज इस अवसर पर अपनी पहली गजल आप को हस्तगत करता हूं,आप आनंद लें। तो..  मित्रों, लीजिए... पेशे..,  खिदमत...  है..,  मेरी  ' पहली गजल'  चाहता.. हूं!  आप,  पढ़ें...,  या  न...  पढ़ें,  देखें..  इसे..,  कम... से, कम..!  नख-शिख...,  नख..!  शब्दशः बस, आखिर तक। चुलबुलाहट' है,  गजल!  मासूम सी!  मासूम!  मन की,  मासूमियत से  निकलना .. तो  चाहती है,  लंबी.. इस। पर, पहरे.. हैं,  तेरी सोच... के,  सोच..! तो अरे! कैसे, और कैसे?  मासूम है! तोड़े ये कैसे?  ऐ, समाज..!  इसपर ...!  हावी है,  तूं... पता है  हम,  सभी को यह.. ठीक से, बता तो?  हां कर इसे!  दाग!  ना.. ना.. दाग,  इसके,  आंचलों पर एक हो ऐसा नहीं! ऐसा नहीं!  निदाग है  यह , समस्या तो हमारी  है आज तक उम्र.. इसकी, क्या.. रखें...  किसी.. को,  मालूम ना.. है..  !...

जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का,

मित्रों, जीवन दाल के दानों की तरह दो भागों में बंटा हुआ है। एक वास्तविक जीवन और एक कल्पना और स्मृतियों का जीवन इसी पर एक नव नाविका प्रस्तुत है। आप आनंद लें। जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का, अनजाने लोगों से  मिल कर, क्षुद्र  क्षणों में, निमिष मात्र में,  सुरभित होकर 'जी' लेने का,  जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का। दृष्टि, किसी की, चंचल उड़ती, आ गिरती जब, बन कर तितली... हृदय पुष्प की, पंखुड़ियों पर, ओस कणों सी हृदय हिलकता थर थर करता जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का। मोती बन कर, एक कल्पना, मनतन, तन्मन शीतल करती,  मोर मुकुट सा, पंख लगाए उर में, तिरती,  हे प्रिय!  बिल्कुल, निपट! किशोरा...वस्था, जैसी  बह जाना, इन मधुर क्षणों में, बन मरीचिका, संग मरीचिका जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का। और यहां,  रखा ही है, क्या?  निजी क्षणों, के स्मृति जैसा!  जीवन को, अभिप्रेरित करता, भौतिकता को, भूल हमें ये, स्वप्निल धारों में ले बहता.. जीवन, उत्सव गुप्त क्षणों का। अनजाने लोगों से  मिल कर, क्षुद्र  क्षणों में,  निमिष मात्र में, जी लेने का,  जीव...

खोजता.किसको... रहा, मैं... जिंदगी भर..?

खोजता...!   किसको... . रहा,  मैं... जिंदगी भर..?   क्या.. कहूँ!  समझ आया, देर.. से  इतने.. दिनों...पर!  लड़कपन,  यौवन..  प्रिये...   अधेड़पन..  भी.., बीतने.. पर! था,  ही..  नहीं...  " मैं"   लहरता! 'वह'  लड़ता.. रहा, भिड़ता.. रहा जिसके... लिए, इस! जिंदगी... भर!  खोजता...!   किसको.... रहा,  मैं...  जिंदगी भर..?   "मैं"... भ्रम.. भरा,  एक, शब्द... था, जिंदगी में, जिंदगी पर  शुरू से हावी रहा !  मैं, दौड़ता..,  सच!   मर गया, जिसके... लिए,  हे,  प्रिये..!  मुझको मिला,  यह!   मेरा  'मैं'  जिंदगी  की ढाल पर..! खोजता!   किसको  रहा,  मैं.. जिंदगी भर..!   मरीचिका सा चमकता अकेला,     घायल!  पड़ा....चुप! देखकर जगत का व्यापार सब!   अब... शिथिल इंद्रिय!  हे प्रिये मैं!  मत  पूछ!  मुझसे, कौन था मैं?  बता न!  खो...

एक पुष्प, पीत.. रंग, ला चढ़ा तूं मां के पद

मित्रों, आप सभी को वसंतपंचमी की हार्दिक बधाई! मां सरस्वती की कृपा हम सब पर बनी रहे इस कामना के साथ आज गीत आपके कर कमल में अनुष्ठित है। फुलबगिया!  तन की खिली!  मन की खिली!   देख न!   कइस.. है, उपवन..  म.. खिली!  बेकशी.. सी महक!  इसकी,  अइस...है, बेताब.!  हुइ, छाई.. कइस?  बांध मुझको, लै... चली,  पूछता हूँ, बता न!  का... बसंत की, खिड़की! खुली?  कुछ तो, हुआ..  होगा?  कहीं..,  कहीं.. तो, हुआ होगा शिशिर में जमा,  द्रौपदी सी देह.. सा मह मह महकता पहाड़...के किसी शिखर का तुषार पिघला, नग्न होगा। अन्यथा... सौरभौं से भरा..  कोई!  ताल, इंदीवर, खिला होगा  अरे अनुपम कहीं?  कुछ तो, हुआ..  होगा?  कहीं..। हवाएं ये इतनी! कैसे?   अरे हैं, उन्वाँनमयि?  आ गई क्या?   पंचमी!  बसंत की, हे.. प्रिये! आज ही।  पूछता हूँ, बता न!  क्या... बसंत की, खिड़की! खुली?  सरस वती, सरस्वती,  बह रही है, पुष्प बन!  खिल रहे ये रूप रंग!  लिख रहे, पुर...

आ.., तुझे एक बार 'छू..' लूं

मित्रों, मौसम बदल गया, प्रकृति अपने आवरण उतार फूल, कलियों, कोपलों और चिड़ियों में चहक कर खिलने लगी है, बसंत दस्तक दे चुका। यह गीत इसी पर, आप पढ़ें आनंद लें। आ.., तुझे एक बार 'छू..' लूं रश्मि है,  तूं,  नाचती, लहरों के ऊपर.. सागरों.. की, आ.. तुझे,  एक बार 'मिल' लूं। चंद्रिका, तूं  रजत लेपित, कुमुदिनी,  पय, उर से निकली,  पारस मणि स्पर्श! तेरा नेत्र से, एक बार  'कर'  लूं, आ.., आ तुझे एक बार छू लूं! रंग तेरा,  फूल.. का,  तितलियों.. का अनोखा..! रब.. से मिला!  बेढ..बा!   अरी!  नजदीक तो, आ..!  रस.. तेरे, एक... बार भीगूं!  आ, आ.. तुझे एक बार 'छू' लूं! पहेली तूं, अनबुझी.. है, जानता... हूं,  सहेली..  ऋतुराज की, मै.. मानता हूं!  कामधेनू..., दूध.. से,  तूं  नहाई!  शुभ्र, स्निग्धा, नवेली.. है,  इसलिए तो  चाहता  हूं, आ, आ.. तुझे एक बार छू लूं! आ तुझे एक बार मिल लूं! खुशबू... है  तूं... वसंतिक,  पुष्पों.. की इन,  सबसे पहली, महकती, परिचय है देती..'मुस्कुराहट' ...

सच कह रहा हूँ, मान मेरी

सच कह रहा हूँ, मान मेरी जानता हूँ..! बहुत..  दिन.. से मरे..!  इस, संसार... को,  नजदीक... से,    देखा.. है,  मैने,  पास.. से.. और पाया, अंत में... धोखा... है,  ये..  सबसे बड़ा ..!  हे, मित्र... मेरे!  इससे ज्यादा, कुछ नहीं.. इससे ज्यादा, कुछ नहीं..यह। किसका, करें..  विश्वास..!  तुम..  ही.. बताओ न!..  अपना... करेंगे?  तो मात्र बस इतना बताएं... गाय.. माता, हम.. सभी की..मानते हैं?   धीमे से क्यों? थोड़ा.,  तेज.. बोलें. क्या सच है ये..?   भीड़ बन, हम इकठ्ठा  होते हैं कैसे! कुछ ही क्षणों में, हंगामा  हैं करते.. रोज टी वी चैनलों पर  देखते हैं,  पूजते हैं,  थाल ले के,  दीप से जलते हुए!  पर, वास्तविकता! अलग हैं, सत्य, इससे विलग! है, स्वस्थ है,जब तलक अरे! वो.. दूध... देती,  हम सभी को... पूज्य है, स्वीकार है, उसके आगे... जब हुई बीमार,  बूढी...,  अशक्त तन.. से,  देखा है मैने,  दूर.. इनको  अब करो,  भगा.. दो जंगल में छोड़ो! जंगल में ...