सच कह रहा हूँ, मान मेरी

सच कह रहा हूँ, मान मेरी
जानता हूँ..! बहुत.. 
दिन.. से
मरे..! 
इस, संसार... को, 
नजदीक... से,   
देखा.. है, 
मैने, 
पास.. से..
और पाया, अंत में...
धोखा... है, 
ये.. 
सबसे बड़ा..! 
हे, मित्र... मेरे! 
इससे ज्यादा, कुछ नहीं..
इससे ज्यादा, कुछ नहीं..यह।

किसका, करें.. 
विश्वास..! 
तुम.. 
ही..
बताओ न!.. 
अपना... करेंगे? 
तो मात्र बस इतना बताएं...
गाय..माता, हम.. सभी की..मानते हैं?  
धीमे से क्यों? थोड़ा., तेज.. बोलें.
क्या सच है ये..?
 
भीड़ बन, हम इकठ्ठा 
होते हैं कैसे! कुछ
ही क्षणों में,
हंगामा 
हैं
करते..
रोज टी वी चैनलों पर 
देखते हैं, पूजते हैं, 
थाल ले के, 
दीप से जलते हुए! 

पर, वास्तविकता! अलग हैं,
सत्य, इससे विलग! है,
स्वस्थ है,जब तलक
अरे! वो..
दूध... देती, 
हम सभी को...
पूज्य है, स्वीकार है,
उसके आगे...जब हुई बीमार, 
बूढी..., 
अशक्त तन.. से, देखा है मैने, 
दूर.. इनको अब करो, 
भगा.. दो
जंगल में छोड़ो!
जंगल में छोड़ो!
बताओ न क्या है ये...!
बताओ न क्या है ये...।


एक दिन
एक, कैंसरी..  
मृतप्राय सी, इक गाय आई,
जाने कहां से, कालोनी में मेरे,
गति बिकट थी, क्या कहूं! 
लटकते! 
उन लोथडो संग, मांस के, 
दुर्गंध मिश्रित चू रहे
प्रिय, रक्त को
देखकर, 
पास... घर के, 
अचानक... 
द्रवित होकर, दुखी होकर, 
उस कष्ट को मैं देखता ही रह गया।

अनुमान करता 
दिवस.. निशि.. 
उसके, 
विपद को
सत्य मित्रों! 
भीतर... कहीं
कातर नहीं, चिंतित हुआ! 

पर, फैलता.., 
हर ओर गिरता...
रक्त वह, दुर्गंध मिश्रित
देखकर, स्वार्थ में,
बीमारियों के प्रबल डर से,
अपने तलक मैं
लिप गया।
दूर... भेजो 
अरे! इसको, चुपचाप! ना 
अनायास! मुंह से, देख उसको 
निकल गया।

ईश्वर!  
है, मित्रों...
देखा उसी दिन! 
त्राण... देता है हमे, 
हर मुश्किलों में, सत्य है! 
आ गया, वह देवता बन, 
देख मेरा कष्ट... 
भारी... 
फटता हृदय, अतीव-तर
और हम मिल, एक संग 
व्यवस्था, से भेज पाए 
उसे, फौरन 
आपरेशन के पटल तक।
पर नहीं, आसान यह सब! 

पूछता हूँ, उन सभी से, 
पालते है गाय कितने शौक से 
और जब अस्वस्थ हो, 
बीमार वह
अंतिम चरण में, असहज हो 
देखती है
स्नेह से, सेवा करो
भगा देते हैं घरों से, दूर उसको
पूछता हूँ! क्या है ये...

किसने कहा, 'कुछ मूल्य हैं' 
जियो उन्हें! 
सच है, ये...
ये भीड़ वाले, जो खड़े हैं,
नारे लगाते, 
तोड़ते उन्हें...सबसे पहले
चौकी..., पे सारा.. 
खेल मित्रों, अलग है,
चौका, तो इनका
अरे!  कितना.. विलग है ।

अरे, यह दुनियां अजब! है,
किस बात पर है, 
भीड़ बटुरी
बे-सबब, यह,।।।
बेकार है सब...
सच कह रहा हूँ, मान मेरी
जानता हूँ..! बहुत.. 
दिन.. से
मरे! 
इस, संसार... को, 
नजदीक... से,   
देखा.. है, 
मैने, 
पास.. से..
और पाया, अंत में...
कुछ नहीं, धोखा... है, 
ये.. 
जय प्रकाश मिश्र


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