आ.., तुझे एक बार 'छू..' लूं

मित्रों, मौसम बदल गया, प्रकृति अपने आवरण उतार फूल, कलियों, कोपलों और चिड़ियों में चहक कर खिलने लगी है, बसंत दस्तक दे चुका। यह गीत इसी पर, आप पढ़ें आनंद लें।

आ.., तुझे एक बार 'छू..' लूं
रश्मि है, 
तूं, 
नाचती, लहरों के ऊपर..
सागरों.. की,
आ.. तुझे, 
एक बार 'मिल' लूं।

चंद्रिका, तूं 
रजत लेपित, कुमुदिनी, 
पय, उर से निकली, 
पारस मणि
स्पर्श! तेरा
नेत्र से, एक बार 
'कर' 
लूं,
आ.., आ तुझे एक बार छू लूं!

रंग तेरा, 
फूल.. का, 
तितलियों.. का
अनोखा..! रब.. से मिला! 
बेढ..बा!  
अरी! 
नजदीक तो, आ..! 
रस.. तेरे, एक... बार भीगूं! 
आ, आ.. तुझे एक बार 'छू' लूं!

पहेली तूं,
अनबुझी.. है, जानता... हूं, 
सहेली..
 ऋतुराज की, मै.. मानता हूं! 
कामधेनू..., दूध.. से, 
तूं 
नहाई! 
शुभ्र, स्निग्धा, नवेली.. है, 
इसलिए तो 
चाहता 
हूं,
आ, आ.. तुझे एक बार छू लूं!
आ तुझे एक बार मिल लूं!

खुशबू... है 
तूं...
वसंतिक, 
पुष्पों.. की इन, 
सबसे पहली, महकती,
परिचय है देती..'मुस्कुराहट' ही है तूं !
कहीं चटकती, कहीं मसकती, 
अंदर से बाहर घूंघटों से 
निकलती,
पोर.. पोरों.., फूटती, कलियों में इन! 
प्रस्फुटी...!
ढूंढता हूँ, मिल न... तूं! 
आ.. तुझे एक बार छू लूं!

देख, ना! 
अरि, तेरी.. कैसे? 
बिखरी.. पड़ी, मणि..! ऐसे.. तैसे...
ललछुहीं रोज़ की, इन... पत्तियों पे , 
ओस कण सी, सुबह ही
विपुल.... इतनी!
कहां है?  
इधर ना....तूं! 
मन चाहता है,
एक बार तुझसे, गले.. लग लूं! 
आ.., तुझे एक बार 'छू' लूं
आ.., तुझे एक बार मिल लूं।

जय प्रकाश मिश्र














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