गंगा हूं मैं, स्वर्ग मेरा धाम है।

मित्रों, धरती पर रहते हुए हमे कुछ चीजे स्वर्ग की भी देखने और छूने को मिल जाती हैं उनमें, मां गंगा प्रमुख हैं। मां गंगा को समर्पित एक शब्द पुष्करिणी, आप भी आनंद लें।

गंगा हूँ ..."मैं" 
वह!! 'स्वर्ग' मेरा धाम है,
निवासिनी मैं.., 
वहीं की.. तो, 
मूल हूँ! 
हे.., मनुष्यों! 
कामना जिसकी.. लिए
तुम! भरमते हो, 
धरा ऊपर, जिंदगी भर।
इसलिए तो कह रही हूँ,
दिन, कुछ बिता लो, साथ मेरे
किनारों पर, 
स्वर्ग सा अनुभव यहां है, 
आओ मिलो, इन रज कणों से
रजत से ये, अधिक सुंदर।

मानती हूँ, आज भी..
तप! तुम्हारा था, 
महाप्राणी... भगीरथ का, 
महाप्रण.. था, 
क्या करें, वो... सामना..! 
भगवान... श्री..
कपिलमुनि के, श्राप.. से था।
सगर के, उस.. राजकुल के 
बालकों का, तरन 
सिवा मेरे, कैसे भी नहीं था।

एक! 
मैं, ही मात्र! 
थी, संसार में, इस.., 
स्पर्श! जिसका
उनके लिए, उस पाप! से, 
मुक्ति में, 
तब, वांछित था।

सुखी थी मैं... 
स्वर्ग में...
आनंद लहरी, ले.. रही थी,
बह रही थी, तरंगों पर 
थिरकती
उर्मियों में, उर मिलाती, 
तरंगित थी।

सोच.. तो, 
पवित्रतम! मैं, अहा! कैसी...
उस समय थी, 
की...
स्पर्श.. से? 
ना...
देखने... से, अरे... ना
बस 
सोचने से, रूप मेरा, 
महामुक्ति.. किस तरह, 
नाम से मैं, दे रही थी।

याद करती, आज... हूँ 
स्वर्ग.. में, 
मैं, 
इस.. तरह की
अनन्यतम.. अकेली थी।

पर... एक 
कोना....,
अंदर.. कहीं, 
मन.. हृदय में, मानवी... था,
भगिनी! थी मैं, बहन थी
इस विश्व भर की 
हर प्राणियों की..
हृदय से, सोच से, 
यही... मेरी..., 
शक्ति थी
बस यही मेरी शक्ति थी।

बहन हूँ, 
उन... 
भाइयों की, सोच कर
जो जल गए, भस्म होकर!
मर गए, 
पड़े है, अधर में, युग युगों से, 
उपकार कर दूं, भाइयों का
नीचे उतर कर, 
धरा पर
बहन हूँ मैं,
प्राण हूं, प्रेम हूँ, निर्मलम-तर! 
बहुत सोचा, 
विचारा, 
मनन करती रह गई, 
मैं कई दिन तक! 

क्या करूं! 
क्या न.. करूं! 
मानवों की धरा ऊपर 
पग धरूं, या न! धरूं, मैं
भविष्य अपना, उसके आगे 
मर्त्य मानुष लोक में, सोचती ही रह गई मैं।

असमंजस, बहुत था,
भावना, 
एक बहन की
कामना, अंदर कहीं, 
परोपकारी, भीतर दबी थी।

जागती, लहर लेती, परोपकारी 
वृत्ति की, रक्त में थी,
इसलिए 
यह, सोच थी
अच्छा करूं, संभव अगर
हो 
किसी का, भला करूं! 

इतनी सी, मेरी 
प्रतिबद्धता 
थी, 
स्वयं से, 
और देखते ही देखते, 
छोड़ सारा, आगे पीछे, 
इसी में मैं... 
द्रवित होती जल बनी।
आ, जटाओं में 
शंभु के, 
मैं.. प्रवाहमयि... हो रह गई।

जब चली मैं स्वर्ग से, 
अकेली, 
तो 
उत्स था, उन्मनी थी, 
हंस रही थी
बहुत खुश थी, 
कल्याण की भावना ले, बह रही थी।
इस लिए तो कह रही हूँ
आज भी...
गंगा, हूँ ..."मैं"
वह!! 
'स्वर्ग' मेरा धाम है, निवासिनी मैं.., 
वहीं की.. तो, मूल हूँ।
हे.., मनुष्यों! 
कामना जिसकी.. लिए
तुम! भरमते हो, धरा ऊपर, जिंदगी भर।

जय प्रकाश मिश्र

Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!