अनुभूति शिव की परम पाएं,
मित्रों, श्रीकपिल मुनि आश्रम, गंगासागर का विशिष्ट स्थान। जो आज भी दिगम्बर मानव मणियों से सज्जित है। इसी पर आज की पंक्तियां आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ आनंद पाएं, कामना है।
श्री...
कपिल..
मुनि का, आश्रम!
आज भी, जीवंत.. है,
ठीक वैसे.., तब था, जैसे!
छत्ता..!
है.., प्रिय!
मधुमक्खियों..का,
हर.. तरफ "ताखों*.."
में.. बैठे...,
भभूत.. पोते,
शिव सरीखे
मुक्त.. हो, संसार से,
संसार.. को,
कुछ, इस..तरह,
ईंट.., पाथर.., मान बैठे!
हे....
मित्र..! मेरे, शीत में भी,
नग्न..वैसे,लंगोटी से हीन!
ये
तुच्छ!
सब कुछ, समझते..
इन.. संन्यासियों को
देख.. आया, पास से,
निज आंख.. से
झरोखों.. में,
मणि..
जड़े.. हों, दहकते,
इस तरह से..
दीखते हैं, सत्य है ये!
निरंजन!
की
अलख! लखते...
लखाते... हैं, पास से
नजदीक जाओ!
पूछ लो...,
जो, कुछ.. भी चाहो...
उपलब्ध हैं, ये...!
विकट हैं, रुक्ष हैं,
दिगम्बर..
शिव... रूप हैं,
देखने में,
पर "हृदय" है, एक..सबका
कोमल!, मुलायम!,
शांत, निर्मल!
स्वच्छ इतना,
अरे!
उनका...
देख... लोगे,
बस, क्षणों... में,
बात कर, स्वरूप अपना,
शब्द के, उन... दर्पणों में।
तैरता.. संसार..!
देखा..
है!
कभी.. !
आंखों... में तुमने!
निरंजन..., की अलख
दिपती..., रोशनी...में!
बोल न!
क्या नजर आई है, कभी?
नहीं... न! अरे, तो..
एक बार जाओ,
श्री गंगासागर!
देख.. आओ...
श्रीहीन "श्री"
को
नृत्य करते, आंख से।
डूब जाओगे
हरे.. हे..!
उन.. क्षणों में,
एक
होकर..
भूल.. कर,
संसार... यह,
तुम विदा लेकर!
अनुभूति शिव की परम पाओ,
सांत्वना! क्यों सिद्धि, पाओ
कामना मेरी, अहे!
ईश्वर करे! तुमको मिले!
कौपीन से भी हीन,
ऊंचे.. आसनों
पर,
छातियों के बराबर,
या और ऊंचे,
गद्दियों
पर,
कोशिका हों, मधु छत्तियों की
दूर तक..
एक सीध में,
लाइनों से हों बनी
उन कोटरों... से..
देखते..
ये..
हम सभी में,
अलख की गति, ध्यान से!
प्यास की, पहचान करते,
अकनते,
कभी रीतते, कभी प्रीतते!
क्षणों में, हंस कभी देते, दबे मन से।
शांत हो,
संसार की, हर गांठ को
हैं... देखते,
चुप खोलते,
भस्म मंडित, साधु
सारे, एक जैसे
दीखते!
सच भी है,
अंतर तो है, हम सभी में
जाति का, वर्ण का, धन धान्य का
रूप, वैभव, ज्ञान का
ये सभी तो, मात्र मोती,
सूत्र,
माला निरंजन का
दूर अपने,
आज के अस्तित्व से।
श्री...
कपिल..
मुनि का, आश्रम!
आज भी, जीवंत.. है,
ठीक वैसे.., तब था जैसे!
जय प्रकाश मिश्र
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