एक होगा, नेक होगा, बदल देगा
मित्रों, गंगासागर में 'डुबकी' एक महासुख की अनुभूति! इसी गंगासागर पर आज की लाइने आप पढ़ें और आनंद लें।
कपिल मुनि का आश्रम और कपिल मुनि,
समय के, उस.. खड्ड में, गिर..
समय के, उस.. खड्ड में, गिर..
समा... जाते,
जाने... न
कबके.!
साथ
ही,
वह द्वीप.. भी।
काल कवलित
काल कवलित
हो, गया.. होता
कभी का...
दोष.. लेकर भस्मिता का।
निर्दोष उन, हजारों
सगर सुतों, का।
पर,
भला हो, भगीरथ का,
भागीरथी का,
पुष्प..
कलिका सा, खिला है
आज भी,
यह
गंगा सागर, रात दिन,
निज नाम, से
मेला लगाए, भक्त जन का।
स्नान पुण्यक...
मुक्ति.. का
ठीक वैसे, चल रहा है
आज भी
सदियों से मित्रों! चल रहा था
भव्य जैसें।
वह, सगर थे,
महा.. पुण्यज, महीपति.. थे,
उस.. समय के,
सागर थे बच्चे, षष्टदश सहस्त्र थे वे,
जो.. "राजसूयक-यज्ञ के
उस अश्व" पीछे
चले.. आए
खोजते.., खोजते...
कपिल मुनि, आश्रम के नीचे!
इंद्र के, करतब से, मित्रों
दुष्टता से।
लालसा
यह, सतत सुख की
पाप! है
कर्म को ले डूबती है
साथ अपने,
अंत में,
देखें न कैसे?
दोष दे,
निर्दोष से,
इन कपिल मुनि को,
फंस गए वो
भस्म हो, श्राप से
सागर सभी, सहस्त्र षष्ठदश
क्षणों... में, मिट्टी बने।
कोई तो होगा,
कहीं होगा, कभी होगा
एक होगा, भी चलेगा,
मगर यदि वह, नेक.. होगा
तपस्वी हरिभक्त होगा
बदल देगा,
दृश्य यह, परिदृश्य यह
सच्चा, सतत, मन हृदय होगा।
"आस" भी, एक सूत्र है
प्रिय!
ध्यान दें!
असंभव, संभव बना दे,
कुछ दिनों में,
शिव शंभु है स्तंभ
मित्रों
विश्वास के यह मूल हैं
आस रखो, विश्वास रखो,
आगे बढ़ो, थाम लेंगे हाथ तेरा
भागीरथ सा, कार्य कर, संपन्न देंगे
भागीरथी का अवतरण
स्वर्ग से, नीचे यहां,
संभव हुआ
शिव जटाओं में, पदार्पण, पहले हुआ।
गंगा, हैं वो...
मां... हैं, वो,
इस जगत की, मानवों की
स्पर्श से, उन उर्मियों की,
छुअन से
राज पुत्रों, सागरों का
अभ्युदय!
मुक्ति
पा...
प्रिय, श्राप से भी हो गया।
नाम तब से,
स्थान का
श्रीगंगा सागर हो गया।
आसान है, यह आज मित्रों
टूर... ही है,
आनंद है, और महासुख है,
नहा लो,
संभव अगर हो, यह पुण्यतम है,
यह पुण्यतम है।
जय प्रकाश मिश्र
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