एक पुष्प, पीत.. रंग, ला चढ़ा तूं मां के पद

मित्रों, आप सभी को वसंतपंचमी की हार्दिक बधाई! मां सरस्वती की कृपा हम सब पर बनी रहे इस कामना के साथ आज गीत आपके कर कमल में अनुष्ठित है।

फुलबगिया! 
तन की खिली! 
मन की खिली!  
देख न!  
कइस.. है, उपवन..  म.. खिली! 

बेकशी.. सी महक! 
इसकी, 
अइस...है, बेताब.! 
हुइ, छाई.. कइस? 
बांध मुझको, लै... चली, 
पूछता हूँ, बता न! 
का... बसंत की, खिड़की! खुली? 

कुछ तो, हुआ.. 
होगा? 
कहीं.., 
कहीं.. तो, हुआ होगा
शिशिर में जमा, 
द्रौपदी सी देह.. सा
मह मह महकता
पहाड़...के किसी शिखर का
तुषार पिघला, नग्न होगा।
अन्यथा...
सौरभौं से भरा.. 
कोई! 
ताल, इंदीवर, खिला होगा 
अरे अनुपम कहीं? 
कुछ तो, हुआ.. 
होगा? 
कहीं..।

हवाएं ये इतनी! कैसे?  
अरे हैं, उन्वाँनमयि? 
आ गई क्या?  
पंचमी! 
बसंत की, हे.. प्रिये! आज ही। 
पूछता हूँ, बता न! 
क्या... बसंत की, खिड़की! खुली? 

सरस वती, सरस्वती, 
बह रही है, पुष्प बन! 
खिल रहे ये रूप रंग! 
लिख रहे, पुराण ग्रन्थ!   

एक.. पुष्प, पीत.. रंग, 
ला चढ़ा तूं, मां के पद..
शीश.. रख, ध्यान.. कर 
देवि.. के तूं, पद.. कमल।

जय प्रकाश मिश्र







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