श्री हरये कृष्णाय नमः
ईश्वर,अपनी ईश्वरीय प्रभा में ही विलीन रहते हैं, हम एक उन्जाला स्वरूप ही उन्हें देख पाते हैं। शेष अपनी अपनी आस्था, विश्वास, समर्पण, अर्पण का रूप होता है जो मस्तिष्क और मन उसमें ढूंढ लेता है, वही देखता च पाता भी है। इसी पर आज की पंक्तियां आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं।
श्री हरये कृष्णाय नमः
द्युति..!
दूर करो,
प्रभु....
दीखते.. नहीं हौ..!
जतन करि
हारी...,
तुम! दीठते नहीं... हौ !
नयन.. मोरे, ,
ये..,
चर्म चक्षु हैं
साधन और...,
दूर करो,
प्रभु....
दीखते.. नहीं हौ..!
जतन करि
हारी...,
तुम! दीठते नहीं... हौ !
नयन.. मोरे, ,
ये..,
चर्म चक्षु हैं
साधन और...,
नहिन हैं..
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हैं..!
ज्योति, तुम्हारी,
परचम..!
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हैं..!
ज्योति, तुम्हारी,
परचम..!
परचम..!
दिव्य! नवल-
दिव्य! नवल-
रससिक्त मनोरम..!
चंचल इतने,
क्षण में कितने
रूप... संवरते..,
टिकतय.. तौ. नहीं, हौ...
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
राम.., श्याम... तुम,
टिकतय.. तौ. नहीं, हौ...
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
राम.., श्याम... तुम,
सांवर.. सांवर..
सांवर.. पर मैं,
सांवर.. पर मैं,
हुई.. निछावर
जब तक खोजूं, रूप.. सांवरा
बदरा बन, बरसत हौ....
जब तक खोजूं, रूप.. सांवरा
बदरा बन, बरसत हौ....
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
कोई कहत तुम,
रंग चंपई!
कोई कहत तुम,
रंग चंपई!
राधा,
संग बिहरत हौ
पीताम्बर फहरत है, ऐसौ..
नजर नहीं, आंटत हौ..
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
सागर ऊपर,, बिंब तुम्हारो
चमचम चमकत, न्यारो! न्यारो!
स्वर्ण रश्मि संजाल,
कुटिल कटि..
ग्रंथि..
तुम्हारो,
नयनन भरम पर् यो हौ
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
सागर ऊपर,, बिंब तुम्हारो
चमचम चमकत, न्यारो! न्यारो!
स्वर्ण रश्मि संजाल,
कुटिल कटि..
ग्रंथि..
तुम्हारो,
नयनन भरम पर् यो हौ
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
श्रवण सुना है,
करतब तुम्हरो!
चपल, चुटिल, तुम
चतुर बहुत हौ,
चितवनि तुम्हरी
जादू जैसी
भक्तन दुःखी कर् यो हौव
द्युति.! दूर करो, प्रभु.. दीठते नहीं हौ..!
जय प्रकाश मिश्र
जय प्रकाश मिश्र
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