प्रसन्न होकर, मैटनी शो देखना!

मित्रों, भारत विशाल देश और मर्यादित राष्ट्र है। इसकी फैब्रिक अटूट ताने बाने से बनी हैं। शिवत्व और देवत्व की समरसता उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम हर आत्म और कण कण में संव्याप्त है। पवन के थपेड़े इसे गति देते हैं। हम सभी एक भारतवासी हैं और कुछ नहीं। इसपर कुछ लाइने और आज के लोगो की जीवन शैली पर एक नजर भी प्रस्तुत है। आप पढ़ आनंद लें।

गंगा यमुना का देश है यह
काव्य हो या गजल हो
सब वस्त्र इसके

अंत... इसका, कभी न.. हो !  

जेहन में, जिंदा.. रहे 

यह,

ख्वाब बन, 

खिल.. मुस्कुराए 

गजल.., यह, 

मनों में, 

हिलती, लिली... सी

काव्य से, सट कर रहे।

 

लट बिखर  उड़ती, 

हवाओं में

मित्र 

प्रिय इस, गजल.. की

मकरंद सी, 

ह्रदय संग मस्तिष्क छूए,

शब्द में, यह उतरती 

पांव तेरे, 

लिपट कर... 

मां भारती! स्तुति करे।

मां भारती! स्तुति करे।


एक संगम, गंगा.. जमुनी.., 

इस धरा पर, 

दाहिनी भुज, बाम सी

कायम रहे।

सत्य है, हम साथ हैं, 

हम साथ थे, चिर दिनों से, 

बहुरंग रंगी फूल, इक संग हों खिले 

सहअस्तित्व 

अपना, 

साथ

में,

मित्र से भी और आगे, 

सहायक, 

ज़ुआठे के बैल से, हम 

एक संग मिलकर चलें।


मजे, लूटें, आप.. सब

एक साथ मिलजुल.., 

घंटो.. घंटों। 

शब्दों में, 

मेरे.. 

पढ़ इसे

और, जिंदगी.. खुशतर बने।


और क्या इस

काव्य से, यहां चाहिए 

लोग सारे..., साथ... एक

मिलजुल प्रिये! 

बनाएं इस देश को 

और देश ही, वो... खुद बने।

पग दो: 

कैसी है? मित्रों, 
नई पीढ़ी! अरे अपनी
नित्य ही,
सुविधा स्वरुपी, चाह... में, यह
विकट होते.. जाल में, 
आकंठ फंसती... 
जा रही 
है। 

दिनोदिन! मैं देखता हूँ 
आंख से
यह दुखद होती, 
पग इधर रखती, जिंदगी की
भांस में, कर्ज ले, ले
अवसाद में, घिर आ.. रही है।

कितना, सुखद है,
लोन.. लेना, आजकल
खरीदना, जो कुछ भी चाहो
चमचमाते हाय! क्रेडिट कार्ड! से, 
भुगतान करना
रोजमर्रा 
चाहतों को, अंक भरना
प्रसन्न होकर, मैटनी शो देखना! 
परिवार संग! किसी मित्र संग
छुट्टियों पर निकलना! 
मौज मस्ती
पूरी 
करना, एयर टिकट से लौटना।
सुखद है, सुंदर भी है, आसान है।

पर एक लम्बा सांप! 
रहता है वहां...
उस पार, सुंदर द्वीप ऊपर..
ट्रंप रहता है जहांपर
किसको पता था, 
बुन रहा था जाल निर्मम!  
विश्व.. के विनाश का वह! 

किसको पता था? 
मनों में, 
वह कलुष पाले... 
फुंफकार.. देगा, इस.. तरह!
टैरिफ लगा कर! 

जिसके कारण....
चांदनी इस रात में
पाला पड़ेगा, बिज़निसों पर
इस तरह..., 
और यह,
तरल बहती जिंदगी,
उधार ले, ले चल रही 
बैंक से..
किस्त रूपी, विपद में
मंदी के प्रिय इस समंदर में
आ फंसेगी, युवा को ले, इस तरह से।

इससे तो अच्छा, अपना युग था
हम जमीं पर थे, 
पर जहां थे, जड़दार.. थे, 
खुरदरी, पोशाक बेशक थी हमारी
देखने में, 
आज के, इस समय से
सुविधा नहीं थी, 
सच है ये,
आवागमन.. की, दवाओं.. की,
फोन. की, उड़ती हुई, तकनीक न थी, 
रफ्तार सच, धीमी बहुत थी
पर आदमी को, आदमी से 
जोड़ती थी, 
जिंदगी से, जिंदगी में रंग भरती
खुश बहुत थी।

सोचता हूँ! 
बचपने में हाय! अपने, 
वस्तुएं जो चाहिए थीं, जरूरत की
नितांत ही, उपलब्ध थीं
गरीबी थी, पर अवसाद न था
कमी थी, पर जिंदगी में प्यास थी, 
माधुर्य था, अनुराग था, प्यार था
एक भी उदास न था।

आज! मित्रों, समझ आया
देर.. से 
जिंदगी तब... 
सुखद थी सुस्थिर अधिक थी
आज सी हिलदुल नहीं थी

आज इसको देखता हूँ, 
शिखर से, 
उपलब्धियां कहते हैं जिनको,
कुछ नहीं है, लिफाफा है
इस लिए
हटाओ पट, 
आवरण खोलो यहां के
देखने दो सत्य, को।
देखने दो सत्य, को।

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!