खोजता.किसको... रहा, मैं... जिंदगी भर..?

खोजता...!  
किसको.... रहा, मैं...
जिंदगी भर..?  
क्या.. कहूँ! 
समझ आया, देर.. से 
इतने.. दिनों...पर! 

लड़कपन, यौवन.. 
प्रिये...  
अधेड़पन.. 
भी.., बीतने.. पर!

था,  ही.. 
नहीं... 
"मैं"  
लहरता! 'वह' 
लड़ता.. रहा, भिड़ता.. रहा
जिसके... लिए, इस! जिंदगी... भर! 
खोजता...!  किसको.... रहा, 
मैं... जिंदगी भर..?  

"मैं"...
भ्रम.. भरा, 
एक, शब्द... था,
जिंदगी में, जिंदगी पर 
शुरू से हावी रहा
मैं, दौड़ता.., 
सच!  
मर गया,
जिसके... लिए, 
हे, प्रिये..! मुझको मिला, 
यह!  मेरा 'मैं' 
जिंदगी की ढाल पर..!
खोजता!  किसको रहा, मैं..
जिंदगी भर..!  

मरीचिका सा चमकता
अकेला,   
घायल!  पड़ा....चुप!
देखकर जगत का व्यापार सब!  
अब...
शिथिल इंद्रिय! 
हे प्रिये मैं! 
मत 
पूछ! मुझसे, कौन था मैं? 
बता न! 
खोजता!  किसको रहा, मैं जिंदगी भर..?  

सिमट कर,
अब एक कोने, 
पड़ा, हूं...
सजीव हैं, चेतनित हैं! 
इंद्रियाँ! सब
पर, थक.. चुकी हैं, 
चुक, चुकी हैं
'वह'...
दूर.. है, 
दूर.. उतने!  दूर, अब...
यह, वही है, 
जग...,
जो, लोटता... था, पांव पर..
मेरे... 
शीश रख कर !
खोजता...!  किसको.... रहा, मैं...
जिंदगी भर..?  

दीख़ता है, 
थोड़ा धुंधला आंख से
पर, सुन रहा हूँ, धड़कने!  
मैं, स्वयं की,
और साथ इनके, 
बज रहे उन नूपुरों की 
दूर उतने,
छमछम! छमाछम! 
उस तरह ही
स्पष्ट! हैं, हर एक..! 
मुझको
पर आज मैं, लैगून हूँ, 
सागर में प्रिय!  
दूर.. हूँ, 
आंधियों की शरारत से
जिंदगी के ज्वार से..

बैठा हुआ, अब सोचता हूँ 
क्या.. 'वही है' जग !
राज्य था, 
राजा  था मैं,
दुम हिलाता, यह खड़ा था जग
आ गया मैं,  दूर.. कितनी,
इतनी... जल्दी 
या भागता यह, 
हाथ से, दूर है अब!

खोजता...!  किसको.... रहा, मैं...
जिंदगी भर..?  
क्या.. कहूँ! 
समझ आया, देर.. से 
इतने.. दिनों...पर! 
लड़कपन, यौवन.. प्रिये...  
अधेड़पन.. के.., बीतने.. पर!

जय प्रकाश मिश्र


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