जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का,

मित्रों, जीवन दाल के दानों की तरह दो भागों में बंटा हुआ है। एक वास्तविक जीवन और एक कल्पना और स्मृतियों का जीवन इसी पर एक नव नाविका प्रस्तुत है। आप आनंद लें।

जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का,
अनजाने लोगों से 
मिल कर,
क्षुद्र 
क्षणों में, निमिष मात्र में, 
सुरभित होकर 'जी' लेने का, 
जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का।

दृष्टि, किसी की, चंचल उड़ती,
आ गिरती जब, बन कर
तितली...
हृदय पुष्प की,
पंखुड़ियों पर, ओस कणों सी
हृदय हिलकता थर थर करता
जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का।

मोती बन कर, एक कल्पना,
मनतन, तन्मन शीतल करती, 
मोर मुकुट सा, पंख लगाए
उर में, तिरती, 
हे प्रिय! 
बिल्कुल, निपट! किशोरा...वस्था, जैसी 
बह जाना, इन मधुर क्षणों में,
बन मरीचिका, संग मरीचिका
जीवन, उत्सव 'गुप्त' क्षणों का।

और यहां, 
रखा ही है, क्या? 
निजी क्षणों, के स्मृति जैसा! 
जीवन को, अभिप्रेरित करता,
भौतिकता को, भूल हमें ये,
स्वप्निल धारों में ले बहता..
जीवन, उत्सव गुप्त क्षणों का।

अनजाने लोगों से 
मिल कर,
क्षुद्र 
क्षणों में, 
निमिष मात्र में, जी लेने का, 
जीवन, उत्सव गुप्त क्षणों का।

जय प्रकाश मिश्र

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