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Showing posts from November, 2025

आदमी में आदमी सा प्यार.. हो।

मित्रों, आज के माहौल को देखते हुए चंद पंक्तियां आप के लिए। सच न हो, यह... चाहता हूँ!  देखता हूँ, सुन.. रहा हूँ!  जी... रहा हूँ!  आज.. जो.!   वह, झूठ.. हो।   इसलिए,  मैं.. हे प्रिये..  सच! प्रार्थित हूँ, अब.. उसी से..,  बुद्धि का, सद्बुद्धि का दाता है, जो..!  कुछ... अलग हो,  आदमी में आदमी सा प्यार.. हो। हे, विधाता!  हम  सभी के, मस्तिष्क में, विष न हो,  मन में, किसी.. के किसी से, बदला...न हो,  हे  प्रभो!   मन सभी का शांत हो। सब, आदमी.. हैं हिंदू.. नहीं, मुसलमां... नहीं सब भारती हैं,  देश हैं, सभी को, यह ज्ञान.. हो। पूछता हूँ! कौन हैं ये... ठीका... लिए हैं पोस्ट करते, अनर्गल पागल कहूं!   वैश्या कहूं!   तालीम दा इंसा.. कहूं!   इन्हें क्या कहूं! मैं सोचता हूँ!  परेशाँ हूँ, कुछ भी कहते  चले जाते... चले जाते, यहां से  अच्छा था ये..। फूल खिलते,  रंगीन प्रिय! यहां प्रीति के, हर रंग के, हर धर्म के आपस में हिल मिल, उछलते संवाद करते, एक होते राष्ट्र के निर...

उत्सर्ग तेरा।

उत्सर्ग तेरा,  दुःख भरा क्यों?  जानता हूँ, टूटता.. है, चटकता है राग, मेरा...।  क्या कहीं, कोई!  इसतरह भी, खींचता... है!  आज.. जाना, लगा रहता सफर प्रिय का, आखिरी!  यह दुख भरा क्यों!  अरे,  नहीं.. रे!  बंधन नहीं हैं,  समझ तो उलझे हुए यह तंतु हैं,  चिपके हुए, पुराने.. प्यार के, स्नेह के, दुःख सुखों के आपसी...; तन से मेरे, इतने दिनों के जुड़ चुके थे, अंदर कहीं, नाजुक हृदय से अब खिंच रहे, और दुख रहे। पोर.. में, मेरे...  तेरा...  कहीं.. रस भरा है जानता हूँ!  आज अब वह सूखता है जाने से तेरे...। संसार, मिथ्या! समझता हूँ!  उद्धव.. सरीखा.... ज्ञान था,  मुझे भी, अब.. फुर्र हुआ है, गोपियों का प्रेम कैसा! कलिल होगा रात दिन, सालता... सलिल बहता, कृष्ण संग आज...  कुछ.. महसूसता हूँ। कुछ नहीं हैं, लोग सारे एक छाया... हिलती, डुलती..., मृदा की यह पढ़... चुका था,  किताबों में,  डोलता यह विश्व सारा, व्यर्थ है!  अब विभ्रमित हूँ,  ज्ञान की सीमा यहीं तक!  प्रेम उससे बहुत ऊपर..!  श्री कृष्ण की वह गोप...

पूस के ही बाद तो, फागुन.. मिलेंगे।

मैं ,  क्यों लिखूं!   सुखगीत..  प्रिय...!  जब, दुख.. में, हो.. तुम!  इसलिए... आ...!  प्रिये..  दुख  पोखरों..  में,  कूदते.. हैं, आज..  मिल हम .. !  उल्लास.. भर कर!  रोती.. हो क्यूं...,!  चल..,  नहाते..  हैं,  कंठ तक..,   ले,  ले..  डुबुकियां... साथ, हम  प्रिय!  मत..  दुखी, हो..  तुम..!   सच..!   सात... भांवर!  प्यार की.. आज.. फिर..,   हम... घूमते  हैं, तालाब में, इन..  दुखों के,  एक संग, रहेंगे..  प्राण प्रिय!  कष्ट..  में,  एक दूसरे के..। संग संग सहेंगे,  वार  इसका..,  जिंदगी में,  प्रण है ये..। आ.. तैरते हैं, दुःख..  जलद में, शौक.. से, धैर्य.. मत खो, समय है.. ये  जिंदगी... कराह! मत प्रिय!   जीवन है, ये.. इसे  पार कर...  इन दुखों में भी, हंसते.. हंसते..। किसने, कहा... किसने, सुना... एक दिन! हम अलग होंगे..  हम, साथ थे, हम साथ हैं, ...

बात. करता, इस तरह, क्यों.. मौन.. है!

मित्रों हम भावी पीढ़ी के लिए वरद हों  इसी पर अति संक्षिप्त पंक्तियां आप के लिए। रंग.. की,  इन..  धड़कनों.. में, कौन.. है?  मुस्कुराकर, बात. करता, इस तरह, क्यों..  मौन.. है!  पूछता.. हूँ, उस.. कली.. से,  फूल, के पीछे.. लगी,  जो..  लरज़ती..  जल्दी..  में है,    रंग.. सारे,  और कितने.., अरे कैसे!  जिंदगी में ,  प्रिये!  भर ले। भूल...  आयी.., ढंग.. सारे डालियों को,  छोड़कर  आगे, बढ़ी.. है,  कुमुदिनी..  की  कली.. यह देख न! सरोवर से,  किस.. तरह!  ऊपर.. उठी है। सच कहूं,  देख! इसको भ्रम हुआ, सच्ची मुझे प्रिय!  क्या.. जीवन.. यही.. है?  जिंदगी है, बेल चढ़ती एषणा* की गुलाबी..  सी.. पिंकिश..  प्रिये!  रंगत, सुनहरी! सपनों की ये.. आह कैसी! आंचलों में छुपाए  ले घूमती है ! उर्वशी यह!   सुंदर, हंसी.. है,    आभा लिए!  तन,  इसका लगा  चांदी चढा  मुझको प्रिये सच!  उम्र..  कैसी खिल रही है, भावना में ढल...

अरी! ओ.. सलोनी..!

मित्रों, श्री कृष्ण प्रेम की लहरी में आप भी डूबे इस उद्देश्य से अति संक्षिप्त एक नवलिका आप के आनन्दार्थ प्रेषित है। अरी!   ओ..  सलोनी..!  बता... री.. तेरा..., रंग कैसा?  घिर आई..  बदरिया,  सांवरी...,  मोरे आंगना...  अरि..! काजरी..! क्या..? उसी.. जैसा! नहीं,.. री,   वे, श्याम.. अंग थे, सांवरे! नीलाभ द्युति ले.. खिल.. रहे थे.. मोरो.. अंग, संघे*...,  माधव, अरी! तब  माधवी ही हो गयो... थे.. रसीलो,... री..! रस.. भरो, थो  तुमको.. दिखो जो, बावरी वह मैं नहीं थी। तूं ये बता मुझे बाँवरी!   अरि..,  श्याम,   लिपटो..,  एक क्षण को, संग मोरो...,  क्षणिक.. ही तो.. मिलन.. थो  री!  जब मैं गिरी  यमुना तटॉ पे  फिसलती.. उठाने को,  कहां थी,  तूं,  उन क्षणों में,  ताड़ती!  मुझको व नो...  में..। अरी!  खुद ही  देख... ना.., मैं, राधिका सी चंपई! शुभ्रवर्णी, रजत.. सी कोपल लहरती आम की ताम्रपर्णी..!  केश मेरे,  होठ..  मेरे,  सारिका के ...

सखि.., रे..! मोहिं.. कान्हा दिला.. दे!

मित्रों कृष्ण प्रेम में बिह्वल एक गोपी की दशा का वर्णन आपके लिए किया है। प्रयास है आप आनंद में डूबें। अरि..!   सुन, न..!  सखी..  मोरि..!  सखी.... मोरि!    तुम, सों....  कहूं!  हां, री..,  तुमसों.. कहूँ!   छुप के ... कहूं!  चुपके कहूं!  लागी... रती..  मोहिं, प्रीति..... री..! उन..., बावरो सों.. मोहन्..  है,  जो.... सच!  अरी....!  उन मोहन्... सों....,  नटखट नटीलो!  उसी...  बालको.. सों। सुन, रे..! सखी..  मोरि..!  सखी.... मोरि,   तुम, सों....  कहूं!  लागी... रती..  मोहिं, प्रीति... री..! सखि.., रे..!  मोहिं....  कान्हा...,   दिला... दे,   बावरो..,  वहि!  साँवरो..,  रे...!   यशोदा.., सों..,  बात कर, रे...!  माखन...,  मैं.... दूंगी.. !  अरी... वाको... पेट भर क्यों?  मटुकि भर.. को,  जाने न दूंगी! अन्य.. घर को,   सुन, न..!  सखी..  सखी.... मोरि,...

अनिंद्य..है, तूं.. सुंदरी!

मित्रों, बालकृष्ण की अनुपमेय हृदयहारी छवि देख कोई ग्वालिन कैसे मुग्ध है, उसी पर चंद लाइने आपके आनन्दार्थ प्रेषित हैं। निंदरी...,   हे..! निंदरी.... अनिंद्य..है, तूं.. सुंदरी!  सुंदरी..!   तुम.. सम, नहीं..  मुझको कभी, दीखी.. अभी री!  तेरो भलो है इसी में... श्रीराधिका का, संग कर री... श्रीराधिके के अंग लग री..। कृष्ण..  मोरो..  बालको.. है  बावरो.. है,  नटखट नटीलो..साँवरो.. है, उसकी तरफ,  मत..  इस तरह तूं झुके नयना, देख री!  भोरो.. है रे,  अभी...  अनछुओ.. है शीतकण सौं, शुद्ध.. है री..!  केश तेरो.. 'कृष्णकालो'  लहलह लहरतो...  नाग कन्या, सम अरी, तूं  मधुकरी री!  यह रूप!  तेरो,  श्याम 'मोरो' रहस्य-आभर*..  पश्यती* री।  ललचतो है, भ्रमर सौं,  काल-कालो, कृष्ण.. मोरो  देख! तुम्ह,.. री,  पुष्प सौं...  मोरे.. श्याम के,  बारे*.. नयन  री... उन्ह नयन बिच , मत  बसों... री... निंदरी...,   हे..! निंदरी.... अनिंद्य.. है, तूं.. सुंदरी!...

बिन बताए समझ रे सखि, क्यों हुआ यह!

मित्रों कविता लंबी है, पर अंत तक जाएंगे तो आनंद जरूर मिलेगा, कोशिश पूरी है। आप आनंद अनुभत करे यही प्रयास है। अयोध्या का बाह्य रंग हँसि खेल का माहौल है,  सखि!  अयोध्या में,  सभी खुश हैं, राम राजा  तो  नहीं, युवराज होंगे,  अहो!  सुनकर!   प्रफुल्लित!   सब, साथ-मिलकर नाचते हैं। अयोध्या का आंतरिक रंग कुछ चल रहा है,  कहीं, अंदर  कोइ..  क्या..  कहे.. कोइ..  क्या करे! ,  खेल  प्रिय... यह  विधाता का...,  बीच में कोइ, क्यों.. पड़े। दशरथ महल के भीतर का रंग मंत्रणा..  मिल,  मंथरा.. संग  कैकयी..., की चल रही है, शाम! धीमे, और धीमे!  अयोध्या में ढल रही है। साजिशें...!  शाही... महल..   दासीरथी.. के  हो रहीं हैं.. पर समझ.. से,  हे प्रिये!   सबके,  परे..  हैं। समय की समिधा मांग हैं, कुछ..  पुरानी.., रखी पड़ी.. जाने.. न कब से... समय.. है! यह उपस्थित!  अब.. कैश कर लें..।  नियति रहस्य पर!  नियति है,  इन.. सभी के  बी...

वक्त की पदछाप हैं, ये झुर्रियां!

मित्रों, हमारे चेहरे हमारे अंतर्मन और हृदय के पटलेख हैं। हमारी बनावट और स्वरूप सब हमारा जीवंत दस्तावेज है। इसी पर कुछ लाइने आप के आनन्दार्थ। ये झुर्रियां.. हैं आसाँ... नहीं हैं,  बनाना, इनको मुखों पर!  हाथ पर, त्वचा पर, हर चोंच पर,  हर मोड पर, इस जिंदगी के। अमिट हैं, ये... वो.. रेख हैं…  लिखी.. हुई समय.. के, पटलेख.. पर मिटा सकता खुद.. इन्हें मैं भी नहीं। कौन लिख कर गया इनको मेरे माथे, और कैसे,  किस समय!  सच कह रहा हूँ! मैने ही नहीं  किसी और ने, देखा नहीं। क्या वश मेरा था,  इन पर कभी,  रोक दूं!  अब और आगे... बढ़ने न दूं, ऐसा नहीं... जो देखते हो, आज तुम  एक भी, मान मेरी, नकली नहीं!  वक्त की पदछाप हैं,  छोड़ी गई... सच सुनोगे ? तो सुनो...  लड़ाई जीती हुई हैं, झुर्रियां  ये... काल के कपाल पर.. लिखी गईं जिंदगी के युद्ध में  हर जीत की हस्ताक्षर..  ये ही मेरी। जय प्रकाश मिश्र

जल भरो, एक कलश.. रखो, मृत्तिका.. का,

आओ.. प्रिये!   हम.., मिल बनाएं  "द्वार"  एक्  ' सद्धर्म'. का..  जल.. भरो, प्रिय..! जल भरो.. एक कलश.. रखो,   मृत्तिका.. का। शील का,  प्रिय!  प्रेम.. का, एक ओर इसके, दीपक.. जलाओ, स्नेह.. का नेह का, इन रास्तों पर.. शीर्ष पर, कुछ आज्य.. रखो दायित्व.. सा। और खोल दो इसको प्रिये  सबके लिए.. 'द्वार'  हो..  प्रिय! मुक्ति.. का.।. द्वार..   हो...,  दरवाजे, नहीं.. हों,  एक भी  और न हो एक भी,  दीवार.. कोई, प्रिय!   कहीं.. भी,  किसी ओर इसके!  नीची.. ऊंची.., चाहे.. जैसी.. हर 'घेर' से, यह.. मुक्त.. हो ध्यान... रखो,  विचारों की बाड़ हो,  बस,  विचारों... तक, भूमि, बिल्कुल.. स्वच्छ हो। द्वार! तुम ऐसा, बनाना....  सांकले*... इसमें, न.. हो कहीं कोई .'रोक' ना.. हो! मुक्त.. आवागमन हो,  द्वार में इस !  हे प्रिये,  बहती.. पवन हो। मुक्त हो जाए,  मगन..  मन..,  नाच जाए, शील में, प्रेम में वह  नहा... जाए, जो भी गुजरे,  प्रिये..  इससे..! एक...

मानव है तूं, अब मिट यहां से।

मित्रों!  खोह है, एक.., मेरे भीतर.. नदी.. बहती, विचारों..  की,  अनवरत  यह, नहीं . रुकती। जबरदस्ती, भेजती है,  रोकता हूँ,  नहीं रुकती, सच है ये... चैलेंज करती,  पिछाड़ती,  मुझको ये अंदर...  अस्तित्व  को,  शिव तत्व को, ललकारती है। मैने कहा,  मैं नियंता, पालन हूँ करता..  देह का इस, नष्ट करता, कौन है तूं!  मुझसे, अलग,  इस.. देह में कहना, नहीं.. है मानती। करूं क्या! मैं, सच सुनो!  स्वप्न में भी,  साथ रहती, हठीली एक क्षण ना छोड़ती।  एक दिन!   सच!  डपट बोली, शांत रह!   चुप! देख सब...क्या हो रहा है। किसने.. कहा...  कर्ता है तूं... विचार है, एक... पुराना,  बस टिक गया है, बड़ा!  करता..., बन गया है?  देख! खुद.., जग चल रहा है। बिना तेरे, उड़ रहीं  मधुमक्खियां.. मधु और सौरभ, बन.. रहा है। खिल रहे हैं पुष्प सुंदर,  महकते, दहकते.. जा देख बन में,  सरोरूह,  अनुपम.. जलों में खिल चुका हैं। लहर, फुनगी.. हवा सारे मस्त हैं, मानव है क्या? तूं!  अकल...

दो रंगे शहर की दो रंगी डगर पर कहां बैठ रोऊं कहां बैठ गाऊं

मित्रों, दुनियां, दिखती कुछ है, होती कुछ है इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ प्रस्तुत हैं। दोरंगे, शहर.. की  दो रंगी.., डगर  पर कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!  बता, मीत.. मेरे,  मैं, किससे.. करूं प्रीति! किससे कहूं रीति!   किसको मैं अपने, हृदय.. से लगाऊं। दो.. रंगे, शहर.. की  दो रंगी.., डगर पर कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं। कोई  सुन... रहा है?  कि, क्या कह रहा है?  निकलता.. ये सूरज!  क्षितिज.. की ललाई..!  किसके.. लिए,  गीत.. लिक्खूं...    प्रिये..! मैं... किसके लिए गीत,  सुंदर..  मैं.. गाऊं..।  दो.. रंगे, शहर.. की  दो रंगी.., डगर  पर कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!  भाव: उदीयमान सूर्य और प्रकृति के अनगिनत लाभ समीर कर शुभ संचरण से सुभाशीष रूप में प्राप्त होते हैं उनके बारे में आज कोई नहीं जानना चाहता। सु-लय-ताल-कीलित  सुगंधित, सुवासित,  सुरभि! प्रात.. की, प्रिय..!  प्रियल, हाय! कितनी... है, अंगों.. को, छूती... नरम हाथ, अपनी... शयन-कक्ष, सोते...  किवाड़ों.. को भेंड़े*...

एक महुआ नशे में था।

मित्रों आज की पंक्तियां लाक्षणिक हैं। महिलाओं के प्रति आए दिन हो रहे वासनात्मक अत्याचार पर यह पंक्तियां तंज हैं। ये लाइनें अत्याचार से प्रभावित बहनों को सादर समर्पित है। दृष्टि..,  उस पर पड़ी..  और   मैं..,  पिघल कर,  प्रिय..!   उसी में, खो.. गया। अब, मैं..,  मैं..., नहीं था,  बस, क्रिया... था, देखते.. ही, देखते..  उस  रूप के जादूगरी की,  रश्मि.. रूपी पाश में, आबद्ध था। जो, हो.. रहा था,  सत्य था,  रूप.. में,  उन नेत्र... में,  अब, मैं.. बसा था दृष्टि,  उस पर  पड़ी जब! हे,  मित्र!  तब  मैं..  तन्मय नहीं,  तद्भव नहीं, तदरूप.. ना  तद.. बन चुका था। एक...,  चंदन..  वृक्ष...,  था...,  प्रिय ! बहुत सुंदर...! जाने न, उसको... क्या हुआ!  उतर कर, चुपके से,  प्रिय.. वह!  मलयगिरि.. के, जंगलों.. से मेरे घर में, आ...,  लगा.., नीचे बहुत!  सामान्य.. घर था,  प्रिये! वह चंदन कहूं या चांदनी!   बढ़ने.. लगा,  यौवन लिया,...