आदमी में आदमी सा प्यार.. हो।
मित्रों, आज के माहौल को देखते हुए चंद पंक्तियां आप के लिए। सच न हो, यह... चाहता हूँ! देखता हूँ, सुन.. रहा हूँ! जी... रहा हूँ! आज.. जो.! वह, झूठ.. हो। इसलिए, मैं.. हे प्रिये.. सच! प्रार्थित हूँ, अब.. उसी से.., बुद्धि का, सद्बुद्धि का दाता है, जो..! कुछ... अलग हो, आदमी में आदमी सा प्यार.. हो। हे, विधाता! हम सभी के, मस्तिष्क में, विष न हो, मन में, किसी.. के किसी से, बदला...न हो, हे प्रभो! मन सभी का शांत हो। सब, आदमी.. हैं हिंदू.. नहीं, मुसलमां... नहीं सब भारती हैं, देश हैं, सभी को, यह ज्ञान.. हो। पूछता हूँ! कौन हैं ये... ठीका... लिए हैं पोस्ट करते, अनर्गल पागल कहूं! वैश्या कहूं! तालीम दा इंसा.. कहूं! इन्हें क्या कहूं! मैं सोचता हूँ! परेशाँ हूँ, कुछ भी कहते चले जाते... चले जाते, यहां से अच्छा था ये..। फूल खिलते, रंगीन प्रिय! यहां प्रीति के, हर रंग के, हर धर्म के आपस में हिल मिल, उछलते संवाद करते, एक होते राष्ट्र के निर...