बात. करता, इस तरह, क्यों.. मौन.. है!

मित्रों हम भावी पीढ़ी के लिए वरद हों इसी पर अति संक्षिप्त पंक्तियां आप के लिए।

रंग.. की, 
इन.. 
धड़कनों.. में, कौन.. है? 
मुस्कुराकर,
बात. करता,
इस तरह, क्यों.. मौन.. है! 

पूछता.. हूँ,
उस.. कली.. से, 
फूल, के पीछे.. लगी, जो.. 
लरज़ती.. 
जल्दी.. में है,  
रंग.. सारे, और कितने..,
अरे कैसे! 
जिंदगी मेंप्रिये!  भर ले।

भूल... आयी.., ढंग.. सारे
डालियों को, छोड़कर 
आगे, बढ़ी.. है, 
कुमुदिनी.. 
की 
कली.. यह
देख न! सरोवर से, 
किस.. तरह!  ऊपर.. उठी है।
सच कहूं, 
देख! इसको भ्रम हुआ,
सच्ची मुझे प्रिय! 
क्या.. जीवन.. यही.. है? 

जिंदगी है, बेल चढ़ती
एषणा* की
गुलाबी.. 
सी..
पिंकिश.. प्रिये! 
रंगत, सुनहरी! सपनों की ये..
आह कैसी! आंचलों में छुपाए 
ले घूमती है ! उर्वशी यह!  
सुंदर, हंसी.. है,  
आभा लिए! तन, 
इसका लगा चांदी चढा 
मुझको प्रिये सच! 

उम्र.. 
कैसी खिल रही है,
भावना में ढल रही है,
पांव की हर,बेड़ियों को तोड़ती
प्यार के रंग, रंग.. रही है।

चल चढ़ाएं प्यार से इसे
आसरा दें, स्नेह का,
आशीष दें,
और क्या अब हम करें! 
बात आगे बढ़ चुकी है..
बस 
खुश रहे 
जीवन, पथों में।
अरे यह, गली जिस भी चल चुकी है।
प्रिय 
रोकना 
संभव नहीं है,
आत्म स्थिर, स्वावलंबी 
जानता हूँ बर्ष से ऊपर हुआ 
यह हो चुकी है।
खुश रहे जीवन पथों में सदा यह
सदभावना, कामना मेरी यही है।

जय प्रकाश मिश्र



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