अनिंद्य..है, तूं.. सुंदरी!
मित्रों, बालकृष्ण की अनुपमेय हृदयहारी छवि देख कोई ग्वालिन कैसे मुग्ध है, उसी पर चंद लाइने आपके आनन्दार्थ प्रेषित हैं।
निंदरी...,
हे..! निंदरी....
अनिंद्य..है, तूं.. सुंदरी!
सुंदरी..!
तुम.. सम, नहीं..
मुझको कभी, दीखी.. अभी री!
तेरो भलो है इसी में...
श्रीराधिका का, संग कर री...
श्रीराधिके के अंग लग री..।
कृष्ण.. मोरो..
बालको.. है
बावरो.. है,
नटखट नटीलो..साँवरो.. है,
उसकी तरफ, मत..
इस तरह तूं
झुके नयना, देख री!
भोरो.. है रे,
अभी...
अनछुओ.. है
शीतकण सौं, शुद्ध.. है री..!
केश तेरो.. 'कृष्णकालो'
लहलह लहरतो...
नाग कन्या, सम अरी, तूं मधुकरी री!
यह रूप! तेरो,
श्याम 'मोरो' रहस्य-आभर*..
पश्यती* री।
ललचतो है, भ्रमर सौं,
काल-कालो, कृष्ण.. मोरो
देख! तुम्ह,.. री,
पुष्प सौं...
मोरे.. श्याम के, बारे*.. नयन
री...
उन्ह नयन बिच, मत
बसों... री...
निंदरी..., हे..! निंदरी....
अनिंद्य.. है, तूं.. सुंदरी!
यमुना के तट.. पर,
रजत पट.. पर
द्रुत.. द्रुमों के, बीच में,
माधवी इस कुंज में
कलिल.. यह
किल्लोल! मत कर, बांवरी।
री.. सांवरी,
अनभिज्ञ है तूं, अभी भी
कान्हा के छल सौं, समझ री
निंदरी...,
हे..! निंदरी....
अनिंद्य..है, तूं.. सुंदरी!
अनभिज्ञ है तूं, अभी... री
कान्हा के छल सौं, समझ री
ना मानती है, कहनो मोरो...
यह...
अभी री
तो, आ बसों...
नयनन्ह में.. इन्ह,
अंसुवन... बहो.. री !
जय प्रकाश मिश्र
रहस्य-आभर*: कृष्ण तुझे भेद भरी नजर से देखते हैं
पश्यती*: देखते हैं
बारे* नयन: बच्चों सी भोली निर्दोष आंखे
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