जल भरो, एक कलश.. रखो, मृत्तिका.. का,
आओ.. प्रिये!
हम.., मिल बनाएं
"द्वार" एक् 'सद्धर्म'. का..
जल.. भरो, प्रिय..! जल भरो..
एक कलश.. रखो,
मृत्तिका.. का।
शील का, प्रिय!
प्रेम.. का,
एक ओर इसके,
दीपक.. जलाओ, स्नेह.. का
नेह का, इन रास्तों पर..
शीर्ष पर, कुछ आज्य.. रखो
दायित्व.. सा।
और खोल दो इसको प्रिये
सबके लिए..
'द्वार' हो..
प्रिय! मुक्ति.. का.।.
द्वार.. हो...,
दरवाजे, नहीं.. हों, एक भी
और न हो
एक भी, दीवार.. कोई,
प्रिय! कहीं.. भी,
किसी ओर इसके!
नीची.. ऊंची.., चाहे.. जैसी..
हर 'घेर' से, यह.. मुक्त.. हो
ध्यान... रखो,
विचारों की बाड़ हो,
बस,
विचारों... तक,
भूमि, बिल्कुल.. स्वच्छ हो।
द्वार! तुम
ऐसा, बनाना....
सांकले*... इसमें, न.. हो
कहीं कोई .'रोक' ना.. हो!
मुक्त.. आवागमन हो,
द्वार में इस!
हे प्रिये, बहती.. पवन हो।
मुक्त हो जाए,
मगन..
मन.., नाच जाए,
शील में, प्रेम में वह
नहा... जाए,
जो भी गुजरे,
प्रिये..
इससे..!
एक.. भी सामान
कोई!
कनक.. का,
इस द्वार के, भीतर न आए,
भीतर रहे प्रिय मात्र,
सुंदर लियाकत..
अरु चलन.. सबका।
संस्कार
तो प्रिय! आएंगे ही..
साथ.. सबके,
बस इसी पर नजर रखना।
द्वार अपना
फ्रेम हो, बस रिंग्स सा,
क्रमवार.. क्रमशः न्यून होता...
दूर.. तक, कुछ दूर तक...
मधुर.. प्रिय.. सानिध्य सा।
कुछ क्षणों.. का
प्रीति का,
शांत सा, तेज अभिमुख
मौन में, लिपटा हुआ!
कुछ कह सके, यह चुप हुआ
अभिप्रेरणा दे, जीवनों को
प्रिये यह, सानिध्य से
उसके आगे,
शून्य.. हो, किसी झील.. सा।
अनंता, छुल छुल छुलकती
लहर ले आनंद का।
जय प्रकाश मिश्र
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