पूस के ही बाद तो, फागुन.. मिलेंगे।

मैंक्यों लिखूं!  सुखगीत.. 
प्रिय...! 
जब, दुख.. में, हो.. तुम! 
इसलिए...
आ...! प्रिये.. 
दुख पोखरों.. में, 
कूदते.. हैं, आज.. 
मिल हम ..
उल्लास.. भर कर! 
रोती.. हो
क्यूं...,! 

चल.., 
नहाते.. हैं, कंठ तक..,  
ले, ले.. डुबुकियां...
साथ, हम 
प्रिय! 
मत.. 
दुखी, हो.. तुम..!  

सच..!  सात... भांवर! 
प्यार की..
आज.. फिर..,  हम...घूमते  हैं,
तालाब में, इन.. दुखों के, 
एक संग, रहेंगे.. 
प्राण प्रिय! 
कष्ट.. 
में, 
एक दूसरे के..।
संग संग सहेंगे, 
वार 
इसका.., जिंदगी में, 
प्रण है ये..।

आ.. तैरते हैं,
दुःख.. 
जलद में, शौक.. से,
धैर्य.. मत खो, समय है.. ये 
जिंदगी...
कराह! मत प्रिय!  
जीवन है, ये..
इसे 
पार कर... 
इन दुखों में भी, हंसते.. हंसते..।

किसने, कहा...
किसने, सुना...
एक दिन! हम अलग होंगे.. 
हम, साथ थे, हम साथ हैं, 
हम, साथ होंगे, ही प्रिये! 
भरोसा.. मेरा धरो, 
विश्वास कर लो, 
एक, दूजे के लिए, हम.. तुम! बनें।

सोच तो! 
क्या... सदा..,
मधुमास के ही, दिन रहेंगे...
रंग सारे..., क्या नहीं, हमको मिलेंगे..
क्या हुआ, 
बदरंग, रंगों.. के, ये.. दिन हैं! 
काट... लो, 
पूस के ही बाद तो, फागुन.. मिलेंगे।

वह, 
कौन है?  
रोता.... हुआ, 
कोई, छिन गया क्या? 
आज... उसका! 
बस, पूछता हूं! 
छिन्नमस्तक 
सा हुआ, 
वह.. घूमता...है! 
देर से, मैं, देखता हूँ, 
घूर्णन.. वह, कर.. रहा.. है,
उस.. चिता का, 
सतत.. तबसे..।
 
बताना, 
मुझको जरा....
वह, आग.. है, या आंच.. है 
या प्रेम.. है! 
जो जल रहा..
जो.., बह.. रहा, बन आंसुओं.. सा
चेहरे पे उसके।

नयन.. इसके, झर.. रहे हैं,
शुष्क प्रिय, यह पुष्प प्रिय! 
कैसे.. कहूँ!  मैं द्रवित हूं! 
मैं, क्यों लिखूं! सुखगीत.. 
प्रिय...! 
जब, दुख.. में, हो.. तुम! 
जब, दुख.. में, हो.. तुम! 

वह.. जल रही हैं, लकड़ियां.. 
या कोई, उनमें जल रहा है! 
चिता है क्यों दहकती 
इतनी भयंकर! 
स्नेह क्या
उसमें किसी का 
तेल.. बनकर जल रहा है।

चतुर, था.. यह!
ज्ञानी.. बहुत था,
आज लावा हृदय में..
ज्वालामुखी का..
काष्ठ सम, सूखे.. मनुज में,
प्रिये... 
कैसे.. बह रहा है।

कोयले की 
कोठरी, 
जिसका हृदय था
क्या लगी है आग!  
प्रिय! उस ही महल में।

मैं, क्यों लिखूं! सुखगीत.. प्रिय...! 
जब, दुख.. में, हो.. तुम! 
आ! प्रिये.. दुख 
पोखरों.. 
में, 
कूदते.. हैं, आज.. संग मिल! 

जय प्रकाश मिश्र







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