मानव है तूं, अब मिट यहां से।
मित्रों!
खोह है, एक.., मेरे भीतर..
नदी.. बहती, विचारों..
की,
अनवरत
यह, नहीं . रुकती।
जबरदस्ती, भेजती है,
रोकता हूँ,
नहीं रुकती, सच है ये...
चैलेंज करती,
पिछाड़ती,
मुझको ये अंदर...
अस्तित्व
को,
शिव तत्व को, ललकारती है।
मैने कहा,
मैं नियंता, पालन हूँ करता..
देह का इस, नष्ट करता,
कौन है तूं!
मुझसे, अलग,
इस.. देह में
कहना, नहीं.. है मानती।
कहना, नहीं.. है मानती।
करूं क्या! मैं, सच सुनो!
स्वप्न में भी,
साथ रहती, हठीली
एक क्षण ना छोड़ती।
एक दिन!
सच!
डपट बोली, शांत रह!
चुप! देख सब...क्या हो रहा है।
किसने.. कहा...
कर्ता है तूं...
विचार है, एक...
पुराना,
कर्ता है तूं...
विचार है, एक...
पुराना,
बस टिक गया है,
बड़ा!
बड़ा!
करता..., बन गया है?
देख! खुद.., जग चल रहा है।
बिना तेरे, उड़ रहीं
मधुमक्खियां..
मधु और सौरभ, बन.. रहा है।
खिल रहे हैं पुष्प सुंदर,
महकते, दहकते..
जा देख बन में,
सरोरूह,
अनुपम.. जलों में खिल चुका हैं।
मधुमक्खियां..
मधु और सौरभ, बन.. रहा है।
खिल रहे हैं पुष्प सुंदर,
महकते, दहकते..
जा देख बन में,
सरोरूह,
अनुपम.. जलों में खिल चुका हैं।
लहर, फुनगी.. हवा सारे मस्त हैं,
मानव है क्या? तूं!
अकल क्या दी,
जरा!
तुझको...
इसी से.. मै देखती हूँ!
तुझको...
इसी से.. मै देखती हूँ!
एक तूं ही पस्त है।
एक तूं ही पस्त है।
एक तूं ही पस्त है।
दुष्ट भी है, स्वार्थी है,
धूर्त.. है
एक तुझमें गुण नहीं,
निज अवगुणों से, त्रस्त है।
एक तुझमें गुण नहीं,
निज अवगुणों से, त्रस्त है।
स्वर्ग था यह!
सुंदर! था कितना,
नर्क तुमने बना डाला...
दूषित हवा, दूषित मृदा, दूषित जलो
को कर है डाला...।
मूर्ख है तूं, सोच कैसा...
नस्ल अपनी बदल डाला...
रोग से तूं मुक्त था
रोगी है खुद को बना डाला।
जरूरत तेरी नहीं है!
चल यहां से..
प्रकृति यह तेरी नहीं है,
चल यहां से,
लड़ रहा है.. फोड़ता बम
थ्रेट.. है, तूं... अब मुझी को
इसलिए...
अब..., चल यहां से..
मानव है तूं, दुष्ट कितना!
अब..., चल यहां से..
मानव है तूं, दुष्ट कितना!
मिट... यहां से।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment