उत्सर्ग तेरा।

उत्सर्ग तेरा, 

दुःख भरा क्यों? 

जानता हूँ,

टूटता.. है, चटकता है

राग, मेरा...। 

क्या कहीं, कोई! 

इसतरह भी, खींचता... है! 

आज.. जाना, लगा रहता

सफर प्रिय का, आखिरी! 

यह दुख भरा क्यों! 


अरे, 

नहीं.. रे! 

बंधन नहीं हैं, 

समझ तो उलझे हुए यह

तंतु हैं, 

चिपके हुए, पुराने..

प्यार के, स्नेह के, दुःख सुखों के

आपसी...;

तन से मेरे, इतने दिनों के

जुड़ चुके थे, अंदर कहीं, नाजुक हृदय से

अब खिंच रहे, और दुख रहे।


पोर.. में, मेरे... 

तेरा... 

कहीं.. रस भरा है

जानता हूँ! 

आज अब वह सूखता है

जाने से तेरे...।

संसार, मिथ्या! समझता हूँ! 

उद्धव.. सरीखा....

ज्ञान था, 

मुझे भी, अब.. फुर्र हुआ है,

गोपियों का प्रेम कैसा! कलिल होगा

रात दिन, सालता...

सलिल बहता, कृष्ण संग

आज... 

कुछ.. महसूसता हूँ।


कुछ नहीं हैं, लोग सारे

एक छाया...

हिलती, डुलती..., मृदा की

यह पढ़... चुका था, 

किताबों में, 

डोलता यह विश्व सारा, व्यर्थ है! 

अब विभ्रमित हूँ, 

ज्ञान की सीमा यहीं तक! 

प्रेम उससे बहुत ऊपर..! 

श्री कृष्ण की वह गोपियां हैं, 

उससे भी ऊपर! पा रहा हूँ! 

हृदय... कैसे! 

कसकता है, प्रेम में

बिछोह में, प्रिय जनों के

किनकता है

अंत में, अरे तुम बिन! 

संसार के अंतिम सफर में

सच अलग है सब..!

उत्सर्ग तेरा, 

दुःख भरा क्यों? 

जानता हूँ,

टूटता.. है, चटकता यह, 

राग मेरा...। 

क्या कहीं, कोई! 

इसतरह भी, खींचता... है! 

सताता है, भाई! बता ना अंत में।

जय प्रकाश मिश्र

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