बिन बताए समझ रे सखि, क्यों हुआ यह!

मित्रों कविता लंबी है, पर अंत तक जाएंगे तो आनंद जरूर मिलेगा, कोशिश पूरी है। आप आनंद अनुभत करे यही प्रयास है।
अयोध्या का बाह्य रंग

हँसि खेल का माहौल है, 
सखि! अयोध्या में, 
सभी खुश हैं,
राम राजा 
तो 
नहीं, युवराज होंगे, 
अहो! 
सुनकर!  
प्रफुल्लित!  
सब, साथ-मिलकर नाचते हैं।
अयोध्या का आंतरिक रंग
कुछ चल रहा है, 
कहीं, अंदर 
कोइ.. 
क्या.. कहे..
कोइ.. क्या करे! , 
खेल प्रिय... यह विधाता
का..., 
बीच में कोइ, क्यों.. पड़े।
दशरथ महल के भीतर का रंग

मंत्रणा.. 
मिल, 
मंथरा.. संग 
कैकयी..., की चल रही है,
शाम! धीमे, और धीमे! 
अयोध्या में ढल
रही है।

साजिशें...! 
शाही... महल..  
दासीरथी.. के हो रहीं हैं..
पर समझ.. से, 
हे प्रिये!  
सबके, परे.. हैं।
समय की समिधा

मांग हैं, कुछ.. 
पुरानी.., रखी पड़ी..
जाने.. न कब से...
समय.. है! यह
उपस्थित! 
अब.. कैश कर लें..। 
नियति रहस्य

पर! 
नियति है, 
इन.. सभी के 
बीच.. में, मछली.. बनी , 
देख कैसे, आ फंसी है! 

कोई क्या करे.., कैसे करे!  
कारज़ हैं, करने.. कितने उसने..! 
दशरथ मरन, 
हनुमत मिलन,
रावण हनन, 
राक्छस उच्छेदन, 
कारज विभीषन
श्रवन हंता कुंवर-दशरथ, श्राप-दर्शन 
स्थापना.. रामेश्वरम
श्री भरत का, निर्मल.. निरूपण।
अनगिनत प्रिय...।
भावी की रहस्य योजना

अन्यथा..
भरत ही राजा बने,
बस यही तो अरमान थे! 
और क्या! वरदान थे? 
क्या था?  इसमें, 
बहुत.. छोटी
बात.. थी,
संभव भी थी, इसके लिए 
राजा प्रिये, निरीह हो, तैयार थे।

बात है, असली.. फंसी 
श्री राम के 
बनवास,.. की,
पर...
मात्र क्या? 
बस..! इसलिए 
प्रिये..! हैं, राजन दुखी! 
चक्रवर्ती..
जी नहीं! उन्हें याद है.. 
वह श्राप! ना वरदान.. प्रिय...
मरते समय उस तपस्वी ने जो दिया था,
अंतिम! समय में! 
पुत्र हंता...
इन्हीं प्रिय, राजर्षि को..। 
समय का फेर

देख न! 
समय के दुष्चक्र में 
कैसे फंसे.. 
राजन कुंवर, अब.. चक्रवर्ती! 
कौशल्या खड़ी हैं, 
हाथ जोड़े..
विनत,
होकर पूछतीं, 
संग उलाहना.. भी..दे, रहीं।

राजन!  
ये.. 
क्या है?  चक्रवर्ती..? 
आपके अधिपत्य में, 
मेरे सहित, 
श्रीराम के संग 
अयोध्या की अधोगति!  
प्रिय.. 
अब! क्या है अगली।
बुद्धि का भ्रमित्व्य 

इतनी 
सजग मति, दासीरथी!
समय के इस भंवर में, प्रिय डूबती, 
उतरा.. रही है, 
स्थिर नहीं है,
परिस्थिति के वेग में, वह बह रही है,
कारण सभी का, 
हे प्रिये 
संक्षिप्त क्या है। 
दशरथ विमल मति खोजती है।
चिंता की नाव

नाव डगमग हिल रही है
डूब जाऊं, शीघ्र मैं..
आतुर.. खड़ी है।
चुप हैं दशरथ
आत्मगत
हैं..। 
पूछते हैं, स्वयं से, 
हे! प्रिये..
कील, दुख की, कीलित.. किधर है।
कौन!  पीछे, इन सभी 
हालात के, प्रिय! ढूंढती है।
श्रवन कुमार कथा

कहानी.., 
तो.. पुरानी है, 
सोचते हैं, चक्रवर्ती! 
कुंवारा.. था, आखेट प्रिय था..
शब्दवेजीधी बाण का, मुझे.. शौक था
विपिन भी, क्या घोर था,
रात्रि का वह समय था,
शब्द सुन कुलकुलाहट का
बाण मारा, शोध.. कर
जा.. लगा 
सरवन 
के
हिय.. पर! 
प्रिये वह तो गिर गया।
श्रवन बचन: 

दौड़ता पहुंचा वहां, 
देख मुझको...
श्रवन, अति विस्मित हुआ
शीघ्र बोला, छटपटाता
अरे! राजन... कोप भाजन.. 
मत बनो, मैं ब्राह्मण.. 
वध मेरा, 
इस तरह बोलो, 
हाथ तेरे, क्यों.. हुआ! 

तूं प्रजापालक! 
रघुवंश वंशी! 
दुष्ट! बुद्धि 
इस तरह कैसे हुआ।
 
त्रुटि हुई है, क्या कोई?  
बता न! 
किसी जन्म का अपराध था, 
इस!  जन्म में, 
ब्रह्म हत्या रूप में, 
परिणत हुआ ।

मैं मृत्यु के, रथ पर चढ़ूं! 
तुम! 
उसके पहले, मां पिता को
जल पिला दो, 
बस यही इतना ही कर दो
मांग लेना क्षमा,
यदि तुमसे बने,
उनसे वे ब्राह्मण हैं, इसलिए 
त्रुटि समझ, 
तुम्हे, माफ कर.. दें।
श्रवन पिता वाच

हा! पुत्र!  तुमने देर कर दी! 
कहां थे, 
दम घुट चुका है 
बूंद, जल.. की, यदि मिली
तो 
शीघ्र! बाबू मुझे दे.. दे..! 
दशरथ वाच: 

हे वरद! 
हे ब्राह्मण! 
हे विप्रवर..! 
हे तृषा पीड़ित..! 
अंधवृद्ध च पुत्र याचित! 
दशरथ हूँ मैं, 
नृप..! तुम्हारा, 
इस अहर में, मैं.. पुत्र-हंता हूँ, तुम्हारा! 
क्षत्रिय हूँ मैं, कर्तव्य मेरा! 
हे ब्राह्मण! तुमको बचाना! 
त्रुटि हुई है, 
हे विप्र!  मुझसे! 
श्रवन पिता वाच: 

हे नृप! शिरोमणि! 
प्रिय! पुत्रहंता!  
अपराध कर, अपराध की..
स्वीकारोक्ति की.. 
स्वयं तुमने 
इस लिए 
चल!  
शांत हो, जब त्रुटि हुई है! 
अंजानता में, तो.. मुक्त है, तूं!  

विनय.. लेकर
विनत..होकर,
आ गया है, शरण मेरे..
मैं, विप्र.. हूँ, 
रक्षक भी तेरा, वरद भी हूँ
कुछ नहीं होगा तुझे, 
मृत्यु तेरी, अमर होगी, 
लोक हित कारण बनेगी! 
पर याद रखना
पुत्र प्रिय है, 
सभी को नृप!  एक सा ही।

इसलिए 
वरदान है यह,
श्राप इसको मत समझना!
श्री राम प्रभु चरण में, तुम शीश रखना
याद में, मेरी तरह तुम स्वर्ग चढ़ना।
याद में, मेरी तरह तुम स्वर्ग चढ़ना।

मुख्य भूमिका एवं आध्यात्मिक सहयोग प्राप्त श्री गिरिजापति प्रसाद तिवारी, आजमगढ़।

जय प्रकाश मिश्र
 









Comments

Popular posts from this blog

एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!

रस्म थी, राग था, अनुराग था और समय सबके पास था