एक महुआ नशे में था।
मित्रों आज की पंक्तियां लाक्षणिक हैं। महिलाओं के प्रति आए दिन हो रहे वासनात्मक अत्याचार पर यह पंक्तियां तंज हैं।
ये लाइनें अत्याचार से प्रभावित बहनों को सादर समर्पित है।
दृष्टि..,
उस पर पड़ी..
और मैं.., पिघल कर,
प्रिय..!
उसी में, खो.. गया।
अब, मैं..,
मैं..., नहीं था,
बस, क्रिया... था,
देखते.. ही, देखते..
उस रूप के जादूगरी की,
रश्मि.. रूपी पाश में, आबद्ध था।
जो, हो.. रहा था,
सत्य था,
रूप.. में, उन नेत्र... में,
अब, मैं.. बसा था
दृष्टि, उस पर
पड़ी जब!
हे,
मित्र!
तब मैं..
तन्मय नहीं,
तद्भव नहीं, तदरूप.. ना
तद.. बन चुका था।
एक..., चंदन..
वृक्ष...,
था...,
प्रिय ! बहुत सुंदर...!
जाने न, उसको... क्या हुआ!
उतर कर, चुपके से,
प्रिय.. वह!
मलयगिरि.. के, जंगलों.. से
मेरे घर में, आ...,
लगा..,
नीचे बहुत!
सामान्य.. घर था,
प्रिये! वह चंदन कहूं या चांदनी!
बढ़ने.. लगा,
यौवन लिया,
सुगंध, भर, गंधमादन..
मित्र वह!
घर को मेरे, सुवासित करने लगा..।
सब किया मैं..,
कर सका, जो....
पर प्रिये..
निष्फल... हुआ
सुगंध.. कैसे? रोकता!
हर सुबह प्रातः निकलती..
विवश करती.., दौड़ती... थी
रुकती.. कहां थी,
और कैसे.. रोकता... मैं!
उसे देखता,
ठेस.. कुमकुम.. रंग था
महकता.., दहकता.., अंगार!
रक्तिम!
सत्व था.. चहकता, मुस्कुराता
पागल बनाता..
क्या कहूं.. वह रूप था
या... रोग था।
वायु उसकी प्रसरती थी
दिग्दिगंतों..! दूर तक
उस.. सुगंधी.. से
लोक! यह अवगत हुआ।
चंदन यही है!
रक्तवर्णी.. ओरिजनल!
लाल.. सुंदर,
सहज, शीतल
प्रियम, अनुपम,
मुस्कुराता
बेलौस मुकुलित, खिलखिला।
चंदन तो खुश था,
देख सबको, लोक को इस!
प्रणत.. हो,
नम्र,
प्रियदर्शन.. किया, सखे! सबका।
पर,
यह.. मनुज थे,
अति.. लालची, वासना.. प्रिय!
मैने सुना, हैं...
काट डाले, अंग सारे,
अरे! उसके,
वह प्रिये, रक्त! से रक्तिम हुआ।
वह मधुमती,
आखिर! सिसकती..,
देखती.. जग! व्यथित.. थी,
दुख.. झेलती,
आदमी के दंश का,
एक दिन प्रिय, मर गई!
एक महुआ
नशे में
था,
पास ही, सब देखकर, विस्मित हुआ!
महक तो, मुझमें भी थी,
पर कत्ल क्यों उसका हुआ।
पूछता.. है, फिर.. रहा,
गलियों में पागल!
दृष्टि जिसकी पड़ी थी
उस नागचंपा
पुष्प पर प्रिय!
पहले पहल।
जय प्रकाश मिश्र
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