सखि.., रे..! मोहिं.. कान्हा दिला.. दे!

मित्रों कृष्ण प्रेम में बिह्वल एक गोपी की दशा का वर्णन आपके लिए किया है। प्रयास है आप आनंद में डूबें।

अरि..!  
सुन, न..! सखी.. 
मोरि..! 
सखी.... मोरि!   
तुम, सों.... 
कहूं! 
हां, री..,  तुमसों.. कहूँ!  
छुप के... कहूं! 
चुपके कहूं! 
लागी... रती.. 
मोहिं, प्रीति..... री..!
उन..., बावरो सों..
मोहन्..  है,  जो....
सच! अरी....! 
उन मोहन्... सों...., 
नटखट नटीलो! 
उसी... बालको.. सों।
सुन, रे..! सखी.. 
मोरि..! 
सखी.... मोरि,  
तुम, सों.... कहूं! 
लागी... रती.. 
मोहिं, प्रीति... री..!

सखि.., रे..! 
मोहिं.... 
कान्हा...,  दिला... दे,  
बावरो.., 
वहि!  साँवरो.., 
रे...!  
यशोदा.., सों.., 
बात कर, रे...! 
माखन..., 
मैं.... दूंगी.. ! 
अरी... वाको... पेट भर क्यों? 
मटुकि भर.. को, 
जाने न दूंगी!
अन्य.. घर को,  
सुन, न..! सखी.. 
सखी.... मोरि,  
तुम, सों.... कहूं! 
सच्ची कहूं, कैसे रहूं! 
लागी... रती.. 
मोहिं, प्रीति... री..!

सच कहूं मैं, और रे! 
इतनों नहीं..
वहि... लाडली...
राधा.. बुला, 
बैठाय.. लूंगी! आंगने में
अपने ही डीठी...!    
नटखट, नटीलो, सांवरे को 
भेज रे!  
मैं क्या करूं? 
सुन.. ना, सखी.. प्यारी सखी 
सच्ची कहूं, कैसे रहूं! 
लागी... रती.. 
मोहिं, प्रीति... री..!

जय प्रकाश मिश्र
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