अरी! ओ.. सलोनी..!
मित्रों, श्री कृष्ण प्रेम की लहरी में आप भी डूबे इस उद्देश्य से अति संक्षिप्त एक नवलिका आप के आनन्दार्थ प्रेषित है।
अरी!
ओ.. सलोनी..!
बता... री..
तेरा..., रंग कैसा?
घिर आई..
बदरिया, सांवरी...,
मोरे आंगना...
अरि..! काजरी..!
क्या..? उसी.. जैसा!
नहीं,.. री,
वे, श्याम.. अंग थे,
सांवरे! नीलाभ द्युति ले..
खिल.. रहे थे..
मोरो.. अंग, संघे*...,
माधव, अरी! तब
माधवी ही हो गयो... थे..
रसीलो,...
री..! रस.. भरो, थो
तुमको.. दिखो जो, बावरी
वह मैं नहीं थी।
तूं ये बता मुझे बाँवरी!
अरि..,
श्याम, लिपटो..,
एक क्षण को,
संग मोरो...,
क्षणिक.. ही तो..मिलन.. थो
री! जब मैं गिरी
यमुना तटॉ पे फिसलती..
उठाने को, कहां थी, तूं,
उन क्षणों में, ताड़ती!
मुझको वनो...
में..।
अरी!
खुद ही
देख... ना..,
मैं, राधिका सी चंपई!
शुभ्रवर्णी, रजत.. सी
कोपल लहरती आम की
ताम्रपर्णी..! केश मेरे,
होठ.. मेरे,
सारिका के होठ से भी
"लाल",
बिंबाफल पके हों,
रस भरे,
इन होठ पर थे,
ओष्ठ..
उन घनश्याम के, री..!
टप टप चुआते.. माधुरी
क्यूं मुझे है देखती तूं!
सौंत सी..!
अरी!
मैं हूँ.. सलोनी..!
बता... ना..
मेंरा..., रंग कैसा?
बोल दे एक बार फिर से
भूल से उस सांवरे के रंग जैसा।
जय प्रकाश मिश्र
संघी * अंगों के साथ लिपट कर एक होना
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