दो रंगे शहर की दो रंगी डगर पर कहां बैठ रोऊं कहां बैठ गाऊं
मित्रों, दुनियां, दिखती कुछ है, होती कुछ है इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ प्रस्तुत हैं।
दोरंगे, शहर.. की
दो रंगी.., डगर पर
कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!
बता, मीत.. मेरे,
मैं, किससे.. करूं प्रीति!
किससे कहूं रीति!
किसको मैं अपने, हृदय.. से लगाऊं।
दो.. रंगे, शहर.. की
दो रंगी.., डगर पर
कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं।
कोई सुन... रहा है?
कि, क्या कह रहा है?
निकलता.. ये सूरज!
क्षितिज.. की ललाई..!
किसके.. लिए,
गीत.. लिक्खूं... प्रिये..! मैं...
किसके लिए गीत,
सुंदर.. मैं.. गाऊं..।
दो.. रंगे, शहर.. की
दो रंगी.., डगर पर
कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!
भाव: उदीयमान सूर्य और प्रकृति के अनगिनत लाभ समीर कर शुभ संचरण से सुभाशीष रूप में प्राप्त होते हैं उनके बारे में आज कोई नहीं जानना चाहता।
सु-लय-ताल-कीलित
सुगंधित, सुवासित,
सुरभि! प्रात.. की, प्रिय..!
प्रियल, हाय! कितनी...
है, अंगों.. को, छूती...
नरम हाथ, अपनी...
शयन-कक्ष, सोते...
किवाड़ों.. को भेंड़े*
दुपहरी तक सोते..
युगल.. को, प्रिये...
आह! कैसे बताऊं?
दो.. रंगे, शहर.. की
दो रंगी.., डगर पर
कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!
भाव: प्रातः काल की ताजी हवा को आज की पीढ़ी जो देर तक बंद कमरों में सोने की आदी है उसे उसका मधुर स्पर्श कैसे कराऊं।
घर घर थी गैया,
घर घर थे बछरू...
पेंन्हाँती.. थी गैया..
उछरते थे बछरू...
चूंकरती थी बछिया... दुआरे पे अपने..
किसको बताऊं! मैं किसको सुनाऊं!
दो.. रंगे, शहर.. की
दो रंगी.., डगर पर
कहां बैठ रोऊं! कहां बैठ गाऊं!
जय प्रकाश मिश्र
(इस गीत की अभिप्रेरणा श्री गिरिजापति प्रसाद तिवारी जी अध्यात्म पुरुष से प्राप्त हुई )
Comments
Post a Comment