वक्त की पदछाप हैं, ये झुर्रियां!

मित्रों, हमारे चेहरे हमारे अंतर्मन और हृदय के पटलेख हैं। हमारी बनावट और स्वरूप सब हमारा जीवंत दस्तावेज है। इसी पर कुछ लाइने आप के आनन्दार्थ।

ये झुर्रियां.. हैं

आसाँ... नहीं हैं, 

बनाना, इनको मुखों पर! 

हाथ पर, त्वचा पर, हर चोंच पर, 

हर मोड पर, इस जिंदगी के।

अमिट हैं, ये... वो.. रेख हैं… 

लिखी.. हुई

समय.. के, पटलेख.. पर

मिटा सकता खुद.. इन्हें मैं भी नहीं।


कौन लिख कर गया इनको

मेरे माथे, और कैसे, 

किस समय! 

सच कह रहा हूँ! मैने ही नहीं 

किसी और ने, देखा नहीं।


क्या वश मेरा था, 

इन पर कभी, 

रोक दूं! 

अब और आगे...

बढ़ने न दूं, ऐसा नहीं...

जो देखते हो, आज तुम 

एक भी, मान मेरी, नकली नहीं! 


वक्त की पदछाप हैं, 

छोड़ी गई...

सच सुनोगे ? तो सुनो... 

लड़ाई जीती हुई हैं, झुर्रियां 

ये...

काल के कपाल पर.. लिखी गईं

जिंदगी के युद्ध में 

हर जीत की हस्ताक्षर.. 

ये ही मेरी।

जय प्रकाश मिश्र



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