मैं क्या जानूं! चितवन, क्या...है,
मित्रों, चितवन उड़ती उड़ती सी कल्पनातीत रंगीन आदृष्टि होती है जो अपनी स्थिति से बेखबर, विलास मिश्रित आनंद का कॉकटेल सी होती है। यह समृद्ध लोगों की वस्तु है। इसके ठीक विपरीत कठिन यथार्थ का पृष्ठ, अभाव होता है जो इन पराविकसित धनवानों द्वारा अपने स्वार्थ में सदा बनाए रखा जाता है इसी पर कुछ लाइने। निरीह बच्चे, बूढ़े इसके शिकार होते हैं, अंत में इन्हीं में से नायक भी निकलता है। आपके लिए प्रस्तुत है। मैं क्या जानूं! चितवन, क्या...है, पंख, नहीं.... दिखते.. हैं, मुझको.. भूख..! मगर, मुझको दिखती है चेहरों.... पर इन..., फीके.. फीके...। उड़ते.. उड़ते.., खुले, बाल... ये.., उलझे...! उलझी... कथा..., कह.. रहे..., कुछ तो, कम.. है, कुछ तो, ग़म.. है नुचे.. हुए से, सुमन! प्रिये... ये। रूखे.. मुंह! और सूखे.. होठ! झूठ..., कहें..! ऐसा..., मत बोल..! लाल रेख! यह, रक्तिम! रक्तिम! अधर नहीं, प्रिय! होठों पर इन! चुप! छुप! कहती मेरी कहानी... बड़ी... पुरानी, खुद ही मुझसे.....!...