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Showing posts from September, 2025

मैं क्या जानूं! चितवन, क्या...है,

मित्रों, चितवन उड़ती उड़ती सी कल्पनातीत रंगीन आदृष्टि होती है जो अपनी स्थिति से बेखबर, विलास मिश्रित आनंद का कॉकटेल सी होती है। यह समृद्ध लोगों की वस्तु है। इसके ठीक विपरीत कठिन यथार्थ का पृष्ठ, अभाव होता है जो इन पराविकसित धनवानों द्वारा अपने स्वार्थ में सदा बनाए रखा जाता है इसी पर कुछ लाइने। निरीह बच्चे, बूढ़े इसके शिकार होते हैं, अंत में इन्हीं में से नायक भी निकलता है। आपके लिए प्रस्तुत है। मैं क्या जानूं! चितवन, क्या...है,  पंख, नहीं....  दिखते.. हैं, मुझको.. भूख..! मगर, मुझको दिखती है चेहरों.... पर इन...,   फीके.. फीके...। उड़ते.. उड़ते.., खुले, बाल... ये..,  उलझे...!  उलझी... कथा..., कह.. रहे..., कुछ तो,  कम.. है,  कुछ तो,  ग़म.. है नुचे.. हुए से, सुमन!  प्रिये...  ये। रूखे.. मुंह!  और सूखे.. होठ!  झूठ..., कहें..! ऐसा..., मत बोल..!  लाल रेख!   यह, रक्तिम! रक्तिम!  अधर नहीं,  प्रिय!  होठों पर  इन!  चुप!  छुप! कहती  मेरी कहानी...  बड़ी... पुरानी, खुद ही मुझसे.....!...

ठीका लिए, हम लोग ही, तो.. गलत थे।

मित्रों, समाज अपनी जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त रहता है, उसे किसी भी फितूर में फंसना अच्छा नहीं लगता, बिल्कुल नहीं भाता। पर कुछ लोग स्वार्थ की रोटी सेंकने के लिए पूरे समाज को मथ डालते हैं।। इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ वह... दीवार..  थी,  शांत..!  चुप!  कोने.. में, इक..!   इस.. धरा के, सदियों.. को, देती... विदाई.....,  और.. मिट्टियों के, सिरों... में मस्तिष्क.. को,  आशीष.. से, प्रेम.. से,  उपकार... से,  आज... तक..,  प्यार... से, नवाज़ती..।  चिर...,  काल.. से वो.... बुत ही थी,  और... क्या.. थी..? पर.... अंदर कहीं...  जाग्रत, भी... थी।  छोड़ो इसे,  बकवास.. सारी... दीवार, तो.., दीवार.. थी, कुछ और, न... थी। एक दिन, कुछ वाकया  ऐसा... हुआ, धर्म..! चुप, एक किनारे,  बैठा... वहीं,  सजदा... किया। बैठा रहा, कुछ देर तक... वह, शांति से,  उठने... को था। बस तभी... एक... मौलवी...  थक हार कर...  युक्तियां, सब, लगाकर बेसब्र हो, वह हर तरह... आवाज...... देता, शरण दो, मुझे शरण दो  भीत...

इसी पर तो पूछता हूँ प्रश्न वह..

मित्रों, परमात्मा की एक किरण संपूर्ण ब्रह्माण्ड को विशुद्ध कर देती है, मानव का हृदय विशुद्ध कर देती है। तो ये हमारे लोग जो नित्य मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघरों में जाते हैं क्यों नहीं बदलते। परिवर्तन कैसे होगा? इसी पर आज की लाइने आप के लिए। कह..  ही... दूं,  अब, सोचता.. हूं,  प्रिये! "झूठा सत्य"  वह..!   जो लपेटे हैं,  इतने  दिनों से... ऊपर ये  सारे... ,  बेवजह!  वह  नित्य... जाता  मंदिरों में, मस्जिदों में,  द्वारे में गुरु के, गिरिजा घरों में..., सब....,  एक जैसा...  टेकते.. हैं, माथ...  प्रिय... एक... साथ,  कैसे! लाइनों... में...। और..  सच.. हैं!   इष्ट... उनके...  सभी.... कहते...। पर आज तक!  ना एक बदला... एक बदले! आदतों.. से,  अधर्मों.. से, प्रिय ये अपने। सब वहीं हैं, उन्हीं जैसे... जो...  आज तक मंदिर.. न...! देखे,  मस्जिद.. न देखे... गुरुद्वारा.. न.. चक्खे, गिरिजा घर, न... झांके।  अंतर ही क्या है?  पूछता हूँ कोई....  बता... दे?...

आ…तुझे मैं, अलग कर दूं..

मित्रों, दुनियां में आ के ऐसे खोए की आखिरी रात तक होश ही नहीं रहा, मूल स्वभाव और मूल कार्य ही भूल गए। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए, पढ़ें और आनंद लें। आ…तुझे  मैं, अलग कर दूं.. आज तेरी.., धूल.. से,  चिपकी हुई है.., जाने कबसे किस तरह, अपनेपने से।  देख तो..,  तूं एक होकर.. बीच में  इस धूल के.. फंस गया है, हाय! कैसे… आख़िर कभी तो, आके मिल  खुद आप से। छुप गया, प्रासाद में तूं,  बस… गया.. छाया तले.., देख तो.. दुनियां रसीली..  महल से, बाहर निकल के। इधर है, इस चिलचिलाती धूप.. में, इस तपन… में, तपस्या के बीच में, करुणामयी इन मूर्तियों के बीच में। आ... किसी दिन, खेत... में  सुन..! घंटियां, बजती हुई, लय ताल में इस बैल के गले से लटकी हुईं  कुछ कह रही हैं, बस तुम्ही से। देख कैसे झूमते हैं  रस ये अपने, काम में भूल जाते है सभी कुछ मस्त रहते आप में। जय प्रकाश मिश्र

चंदन.. शीतल, काया उनकी

मित्रों, नवरात्रि में सबकुछ शिवात्मिका शक्ति से सराबोर है। शिव भोले और शक्ति एक ही हैं अर्धनारीश्वर उनका रूप है। आप, आज भोले बाबा पर थोड़ी सी पंक्तियां आदर सहित पढ़ें और आनंद लें। बाबा…!  मोरो.. इंद्रधनुष.. सतरंगी..,  कब.. दीखें, कब.. प्रकृति लयी.. हों सहज.., सुघड़.., अडभंगी..। बाबा…! मोरो..   इंद्रधनुष... सतरंगी..। चंदन.. शीतल, काया उनकी श्वेत, चंपई.. रंग की, बहुराहें, बाउरि.., बौरहवा..  सारे.., उनके.. संगी…। बाबा…! मोरो..   इंद्रधनुष... सतरंगी…। अनमन.. दीखत.., अनमनि-वस्था..  चेतन, जागृत.., मन की सकल डो..रि, बां..धे.. घू..मत हैं करत.. हैं, अपने.. मन की। बाबा…! मोरो..   इंद्रधनुष... सतरंगी…। अवघर.. दानी, ’मान’ न.. जानैं  शिशु.. सम हंसंय,  कला..  सब जानैंय..।  चौंसठ.. योगिनि, के संग नाचैंय.... नाच…’भैरवी,  रव.. की…। बाबा…! मोरो..   इंद्रधनुष... सतरंगी…। आनंद.. ढरकै,  बहै…., रस.. गागरि!   डम डम डमरू बहुत निक लागय!  सरल.., सुखद.. मनमौजी..। बाबा…! मोरो..   इंद्रधनुष... सत...

कौन सा वह द्वार.. है

मित्रो, जीवन स्थितियों का एक खजाना है, और विशिष्ट अनुभूतियां यहीं मिलती है। एक द्वार या एक बदला हुआ दृष्टिकोण पैदा हो जाता है जब हम नितांत अंतिम रूप से रिस्क ले जीवन से गुजरते हैं। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए। कौन सा वह द्वार है,  विकल करता  है, मुझे.... संवेदना.. में, डुबाता.. है,  मित्र सबके....। कोई भावना... है,  ज्ञान.. है,  कर्तव्यता... है, सीज़ कर, पसीज कर, भीतर प्रिये!  मैं भीग.. जाता,  प्रेम... मे ।   करुणा..!  मुझे, क्यों..  घेर... लेती, घेर..,  अपने... 'बाजुओं' में,  क्यों तैरता हूँ, सागरो... में,  कष्ट.. के। बैठा यहीं, इस पार, नद.. के,  पार... उस उस.. पार, नद.. के..  बस.... रहे,  उन जंतुओं... के,  जीवनों.. के, बीच.. मैं। मैं.. रह रहा हूँ,  बंध... रहा हूँ कल्पना.. की, डोर...  उनकी.... मुश्किलों मैं। कौन सा वह... 'द्वार' है,  विकल... करता है, मुझे....  संवेदना में,  डुबाता है, मित्र सबके....।  जानता हूँ! सब एक है... एक ही 'वह'  हर... जगह... है। श्वान में, म...

उपहास! तुम, उसका न करना,

मित्रों, नवरात्रे चल रहे हैं, लोग अनेक रूपों में आपके सामने आयेंगे, आप उन सभी को कुछ दे न दे, मनुष्य का सम्मान जरूर दें, दुत्कार न दें। उन बे घरबार लोगों को समर्पित चंद लाइने। आप पढ़ आनंद लें। सहज है जीवन यहां, सहज सारी प्राप्तियां...  आसान... होगा,  रंग... कोई!  पहनना..., सामान.. चुनना... बटोर कर, परिश्रम... से,  घर... में रखना,  दुनियाँगिरी.. है, याद रखना। मित्र मेरे, उपहास!  तुम, उसका न करना। साधु हैं जो, मांगते हैं,  नापते हैं, दिल.. तुम्हारा!  कठिन... है,  सहज... होना, सहज... रहना रंग... कोई,  एक... जी, बस..  एक... चुनकर, जिंदगी भर... पहनना...। छोड़... देना, सभी कुछ, और पकड़ लेना, रास्ता, तन्हाइयों का, विकट तम..  समय पर विश्वास  रखना, बढ़ते रहना, अडिग..  वर्षों... वर्ष, कुछ ना बोलना... शांत रहना, शांत रहना, शांत रहना। बल..., नहीं.. चलता... वहां पर, धैर्य, के बल पर वो रहता देखता है, सत्य.. को, इस जगत में.. चुप... ध्यान करता, मगन रहता विधाता पर, मान तुममें.. विधाता को जीवन है जीता...। चयन किसका वह करे,  एक.. स...

एक दुनियां यहीं है, दुनियां में इस,

मित्रों, आज की लाइने समाज के सबसे कमजोर तपके को समर्पित! आप भी पढ़ें और आनंद लें। एक दुनियां यहीं है, दुनियां में इस, एक् लोक है, सूखा... हुआ, निर्वस्त्र... ही!  कुछ... अलग है,  दुनियां से इस,  भयावना.....!  लोलता.. रूप में,  स्निग्धता  चमड़ियों पर शून्य ही। यथार्थ का, अनुराग का, प्रिय! नग्न ही। चादर नहीं है,  पास इनके, ओढ.. लें, कुछ छुपा लें, आड कर लें,  जिंदगी!  कपड़े नहीं... हैं,  बनावटी..., रंगीन खिलते... रंग, के... फीके.. सभी,  बे.. ढंग के... आकार में प्रकार में। ऐ जिंदगी!  वे पहन.. लें, कुछ खुला है, तो खुला है!  कुछ ढका है, तो ढका है!  बे-खबर!  सब,  क्या?   दुख.... ! रहा है क्या?  दिख...! रहा है,   जिंदगी!  चोर नजरें नहीं हैं, इस लोक में, जो, झांकती हैं,  पास के भी घरों... में, फटते हुए उन स्तनों के वस्त्र में, कुछ ना छुपा है, सब, सत्य.. है, जो कुछ जहां.. है कुछ... नहीं, कितना.. भी हो,  किसी ने...,  न, ढका... है। एक, सत्य है, उघड़ा यहां,  हर ओर फैला, फु...

सृष्टि से भी मिल लिया मैं,

मित्रों: ईश्वर हर कण हर वस्तु में हर क्षण अवस्थित है। उनका दर्शन उनकी कृतियों में कर आनंद लेना चाहिए। इसी पर संक्षिप्त रस मंजरी आप के लिए। एक् फूल.. देखा !  सहज.. सुंदर... डालियों  पर.. मुस्कुराता..  नवल! छवि.. लय!  खिल.. खिलाता, इठल करता.. मधुर..., मधुमय...।   देख..  उसको,  खिल.. गया,  मैं....। साथ उसके..  उसी.. में... दर्शन... किया,  उस..  विधाता.. का,  विधाता... से,  एक तरह प्रिय!  मिल... लिया, मैं...। कैसी नमी.., लावण्य.. कैसा!  सादगी, अज़्बो.. ग़ज़ब!   सब कुछ बनाया  विधाता का..  समझ...  आया,  रीझ कर.. उन विधाता की कृति पर, आनंद से भी, मिल लिया, मैं..। एक् फूल से मिल!   गौर..., से..  देखा..  उसे... अपने पने से, पास... से,  मुक्त.. मन से, राग से, विराग ले!   समझ कर,  परफेक्टनेस...,  उनकी बनाई, चीज... में,  हर... चीज से ही, मिल लिया, मैं...। वह 'एक' है,  एक ही... 'कारीगरी' है हर, जगह... कारीगरी को समझ कर... फैली हुई,  इस.. लह...

आज मैं उससे मिला... जो.. खुश कभी था,

मित्रों, जीवन एक निराला खेल होगा पर हम सभी इस कारण के मूल में हैं। अतिमहत्वाकांक्षा और हमारी स्वीकृत व्यवस्था भी कारण है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें, आनंद लें। आज मैं उससे मिला... अंधेरों... में,  घर... है, जिसका..., दुर्दिनों.. में, है... पड़ा!  उदास... था!  गमगीन... भी, क्या क्या कहूं!  ऐ.. जिंदगी!  हाल-ए-शिकवा.. गिला..,  निज!  मित्र का। आज....  मैं.., उससे.. मिला... जो.. , खुश.. कभी था, फूल.. सा, साथ था, हम.. सभी.. के,  हम.., सभी...  जैसा। नजदीक.. से,  देखा!  तुझे.. है, पास.. से, ऐ..!!  जिंदगी...!  आवरण में सिल्क के, और... नग्न.. भी..!   पर, यहां पर.., तुम  अलग... थीं उस.., मित्र... में.. अंधेरों.... में  सिसकती.. कुछ न कहती..  बस सोचती.., और...सोचती, फिर सोचती...। घुटते.. हुए,  घुटते हुए.., एक बार फिर... घुटते हुए!  तोड़ते दम...  उम्र.. की दहलीज पर... अवस्था.. से, पहले..। हे प्रिये!   ............ सत्य... है,  ये..,  व्यवस्था..... में आदमी की!  सभ्यता......

तुम अलग हुए, तो.., सितारे अलग.. हुए।

मित्रों, सच्चे प्रेम के लिए ताम झाम नहीं सादगी ही इसका पोषण होती है। एक क्षण का सच्चा प्रेम जीवन भर की आस बन जाता है। उससे जुड़ी हर चीज सुंदर बन जाती है, विपरीतता भी इसको डिगा नहीं पाती। प्रेम पारस ही होता है जीवन के लोहे को सोने के चमक और आभूषणत्व में बदल देता है। आया....,  तेरा… खयाल....  मेरे.. आंसू…. निकल गए, तुम क्या… मिले…  मुझे,  की बस... मेरे..   हमदम…. ही बन गए..। वो..,  दर… तेरा… अब  आज... का,  मेरा...  मंदिर... ही, हो... गया  जिस दर पे, पहली... बार तुम, आ...  मुझसे.... थे..,  मिले।  शबनमी वो शाम,  बरबस...  कैसे... थम गई..., हम... खड़े, वहां..,  उसे...  निहारते.... रहे।   बरसती... रही,  वो.. बदली, टूट.,. टूट..., कर..., ना चाहते हुए भी हम दो...  भीगते... रहे। चाहत नहीं थी,  जिंदगी..., कुछ, अलग.. ही हो!  पर, सिल्क सी,  गुजरी... कभी... कभी.. कांटो में आ फंसे...! तुम... साथ थे,  तो...., साथ.. थे,  जन्नत... के दिन मेरे, तुम अलग हुए,  तो.., सितारे अल...

केशुओं की कृष्णता से खेलती यह..

भाव: आदमी निरा भोजन और दवा से स्वस्थ नहीं हो सकता। हम जो स्वांस लेते हैं वह अति महत्व की है। जो पानी पीते है वह उससे और महत्व का है। और सबसे महत्वपूर्ण है शांत, हरीतिमा भरा स्वच्छ, साफ सुथरा वातावरण। और यह सब नेचर खुद करती है। हम अधिकतम पौधे लगाएं, बाग, जंगल और पहाड़ों की वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाएं तो हमें यह सब मुफ्त मिल सकता है। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए। ऑक्सी-रिच.... हवाएं,  साफ..  निर्मल.., सदाएं सुंदर.. हरीले  पेड़.. पौधे.. ये.. सब,  हमे.. भी चाहिए!  तो चलो.. हम आज ही  पादप... लगाएं,  प्यार.. से, उसको..जिलाएं  पुत्र... सा,  आ.., मिल...सभी, वृक्ष... सुंदर...,  हरीला... उसको बनाएं। आज का गीत... चल, गीत गाऊँ, सुरभि.. का मैं,  सुंदर है ये.. शीतल... बहुत है, पावनी हैं... मंद, मन्द्रिल..  शिखर पर उस, पात ऊपर,  बह रही है, गुनग़ुनाती जा रही । लहर लेकर.. पुष्प के संग..  नाचती है, चूमती है दूर है.. हर व्यथा से यह.. मुस्कुराती.. स्नेह भरती  जा रही है। केशुओं की कृष्णता से खेलती है..  छू रही है, अनछुए  अध...