इसी पर तो पूछता हूँ प्रश्न वह..

मित्रों, परमात्मा की एक किरण संपूर्ण ब्रह्माण्ड को विशुद्ध कर देती है, मानव का हृदय विशुद्ध कर देती है। तो ये हमारे लोग जो नित्य मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघरों में जाते हैं क्यों नहीं बदलते। परिवर्तन कैसे होगा? इसी पर आज की लाइने आप के लिए।

कह.. 
ही... दूं, 
अब, सोचता.. हूं, 
प्रिये! "झूठा सत्य"  वह..!  
जो लपेटे हैं, 
इतने दिनों से...
ऊपर ये सारे...बेवजह! 

वह 
नित्य... जाता 
मंदिरों में, मस्जिदों में, 
द्वारे में गुरु के, गिरिजा घरों में...,

सब...., 
एक जैसा... 
टेकते.. हैं, माथ... 
प्रिय... एक... साथ, 
कैसे! लाइनों... में...।

और.. 
सच.. हैं!  
इष्ट... उनके... 
सभी.... कहते...।
पर आज तक! 
ना एक बदला... एक बदले!
आदतों.. से, 
अधर्मों.. से, प्रिय ये अपने।

सब वहीं हैं, उन्हीं जैसे...
जो... 
आज तक
मंदिर.. न...! देखे, 
मस्जिद.. न देखे...
गुरुद्वारा.. न.. चक्खे,
गिरिजा घर, न... झांके। 

अंतर ही क्या है? 
पूछता हूँ
कोई.... 
बता... दे? 
इन सभी से, अनपढ़े में, 
एक...मूर्ख में!
चालाक हैं ये, 
कारण यही हैं,
ये कभी...भी, 
अब तक न., बदले...।

क्या "सत्य" है, फिर सोचता हूं! 
सुना है, और देखता हूं! 
जब एक मछली.. 
लालची...
लालसा... में, बंध.. गई,
सत्य.. ही,
चारे.... से, अपने..
प्रिय! 
वह, ना बचेगी, 
फंसे... गी 
ही, 
बंशरी* के, कुटिल छल में।

अच्छी है वो...
इन... मानवों से...
पक्की तो है,
उपासना.. में, 
भले ही आसक्ति.. में..।

सत्य पर वह टिकी तो है...
देखा इसे है 
सत्य मैने,
जिंदगी में, 
जिंदगी देते हुए, फंसते हुए
छटपटाते.. मरते हुए, तुच्छ से 
चारे बने उस कीट के।

इसी पर तो पूछता हूँ 
प्रश्न वह..
क्या एक मुल्ला, मौलवी, 
पंडित कोई...
भाई कोई, अरदास का..,
जाेजेफ कोई क्राइस्ट का...
जान देता है कभी इस 
मछली सा..
सत्य पर, 
निज इष्ट के
कभी मान कर, कहना भी उनका।

कैसे बचे हैं ये सभी, 
परमात्मा की किरण.. से
जो धुलती नहीं, 
है स्वच्छ... करती
एक पल में, जिंदगी, 
पापी से पापी दुष्ट जन के
हृदय.. को।
क्या धोखा हैं ये? 
सोचना, और सोचना, तुम सोचना!
फिर मिलूंगा मैं कभी
तुम्हें रास्तों में।

जय प्रकाश मिश्र
 बंशरी * मछली पकड़ने की एक युक्ति, बांस के डाली की लंबी लकड़ी (कंटिया)।

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