तुम अलग हुए, तो.., सितारे अलग.. हुए।

मित्रों, सच्चे प्रेम के लिए ताम झाम नहीं सादगी ही इसका पोषण होती है। एक क्षण का सच्चा प्रेम जीवन भर की आस बन जाता है। उससे जुड़ी हर चीज सुंदर बन जाती है, विपरीतता भी इसको डिगा नहीं पाती। प्रेम पारस ही होता है जीवन के लोहे को सोने के चमक और आभूषणत्व में बदल देता है।

आया...., 
तेरा… खयाल.... 
मेरे.. आंसू…. निकल गए,
तुम क्या… मिले… 
मुझे, 
की बस...
मेरे..  हमदम…. ही बन गए..।

वो..,  दर… तेरा…
अब 
आज... का, 
मेरा... मंदिर... ही, हो... गया 
जिस दर पे, पहली... बार
तुम, आ... 
मुझसे.... थे..,  मिले। 

शबनमी वो शाम, 
बरबस... 
कैसे... थम गई...,
हम... खड़े, वहां.., 
उसे... 
निहारते.... रहे।
 
बरसती... रही, 
वो.. बदली,
टूट.,. टूट..., कर...,
ना चाहते हुए भी
हम दो... 
भीगते... रहे।

चाहत नहीं थी, 
जिंदगी...,
कुछ, अलग.. ही हो! 
पर, सिल्क सी, 
गुजरी... कभी...
कभी.. कांटो में आ फंसे...!

तुम... साथ थे, 
तो....,
साथ.. थे, 
जन्नत... के दिन मेरे,
तुम अलग हुए, 
तो.., सितारे अलग.. हुए।

जय प्रकाश मिश्र



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