ठीका लिए, हम लोग ही, तो.. गलत थे।

मित्रों, समाज अपनी जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त रहता है, उसे किसी भी फितूर में फंसना अच्छा नहीं लगता, बिल्कुल नहीं भाता। पर कुछ लोग स्वार्थ की रोटी सेंकने के लिए पूरे समाज को मथ डालते हैं।। इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ

वह...
दीवार..  थी, 
शांत..!  चुप! 
कोने.. में, इक..!  
इस.. धरा के,
सदियों.. को, देती... विदाई....., 
और.. मिट्टियों के, सिरों... में
मस्तिष्क.. को, 
आशीष.. से, प्रेम.. से, 
उपकार... से, 
आज... तक.., 
प्यार... से, नवाज़ती..। 

चिर...,  काल.. से
वो.... बुत ही थी, 
और... क्या.. थी..?
पर.... अंदर कहीं... 
जाग्रत, भी... थी। 

छोड़ो इसे, 
बकवास.. सारी...
दीवार, तो.., दीवार.. थी,
कुछ और, न... थी।

एक दिन, कुछ वाकया 
ऐसा... हुआ,
धर्म..! चुप, एक किनारे, 
बैठा... वहीं, 
सजदा... किया।

बैठा रहा, कुछ देर तक...
वह, शांति से, 
उठने... को था।
बस तभी...
एक... मौलवी... 
थक हार कर... 
युक्तियां, सब, लगाकर
बेसब्र हो, वह हर तरह...
आवाज...... देता,
शरण दो, मुझे शरण दो 
भीतर घुसा...।

विकल हूँ मैं..., विकल है जग...
क्या करूं....!
तुम धर्म हो! कोई रास्ता दो? 
रास्ता दो? 
धर्म बोला, शांत.. हो, 
प्रिय! सबसे पहले, शांत हो...!

बैठे रहे, कुछ देर.. दोनों...
शांत... ही,
फिर, धर्म.. बोला...
कौन... है, मस्तिष्क..  वह,
जो..., विकल.. है,
पहचान कर...!
उसे... मेरे, पास.. ला..,
ये, विकलता मस्तिष्क की किस
समस्या.. है
बस यही, मुझको..  बता, 
 

वह!  खुश हुआ, 
बाहर चला..
सोचता..., बस सोचता...
घूमकर, अंदर... हुआ।
समस्या तो, मुझी... में थी,
जग में, नहीं... थी,
भांपकर.. 
धर्म के, चरणों गिरा...।
कहने लगा, 
मस्तिष्क ही मिलता नहीं..
जो विकल था, मैं क्या करूं! 
हे धर्म तूं! मुझको बचा!

धर्म बोला, 
सब एक हैं, सब एक थे,
बस 
कभी... तुम...! 
हे.. प्रिये, 
ऐ... मौलवी
कभी हम,  दीवार... ये! 
ही..., 
गलत.. थे।
लोग तो "सब" सही थे,
लोग तो "सच" सही थे, 
लोग तो  "बस" सही थे।
ठीका लिए, हम लोग ही, 
प्रिय..!  गलत थे।


जय प्रकाश मिश्र



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