उपहास! तुम, उसका न करना,
मित्रों, नवरात्रे चल रहे हैं, लोग अनेक रूपों में आपके सामने आयेंगे, आप उन सभी को कुछ दे न दे, मनुष्य का सम्मान जरूर दें, दुत्कार न दें। उन बे घरबार लोगों को समर्पित चंद लाइने। आप पढ़ आनंद लें।
सहज है जीवन यहां, सहज सारी प्राप्तियां...
आसान... होगा, रंग... कोई!
पहनना...,
सामान.. चुनना...
बटोर कर, परिश्रम... से,
घर... में रखना, दुनियाँगिरी.. है,
याद रखना।
मित्र मेरे,
उपहास! तुम, उसका न करना।
साधु हैं जो, मांगते हैं,
नापते हैं, दिल.. तुम्हारा!
कठिन... है,
सहज... होना, सहज... रहना
रंग... कोई, एक...
जी, बस..
एक...
चुनकर, जिंदगी भर... पहनना...।
छोड़... देना, सभी कुछ, और पकड़ लेना,
रास्ता, तन्हाइयों का, विकट तम..
समय पर विश्वास
रखना,
बढ़ते रहना, अडिग..
वर्षों... वर्ष, कुछ ना बोलना...
शांत रहना, शांत रहना, शांत रहना।
बल..., नहीं.. चलता... वहां पर,
धैर्य, के बल पर वो रहता
देखता है,
सत्य.. को, इस जगत में..
चुप... ध्यान करता, मगन रहता
विधाता पर, मान तुममें.. विधाता को
जीवन है जीता...।
चयन किसका वह करे,
एक.. सा है, देखता
अच्छे.., बुरे.. को;
प्रसाद हो परमात्मा का, हर रूप में
तुम!
यह समझता,
जब विकल होता, रोता नहीं,
मूल चेहरा!
उसका क्या है?
देखता, सोचता... ..
कोई नहीं है, आवरण बीच में
सत्य के और उसमें
समझकर
उस स्थिति में,
बैठ कर! कठिनाइयों को
पार करता।
साधु है वह, फकीर है, बाबा है कोई!
फर्क क्या है?
एक ही
वह, धरा पर है,
जो सभी को, दुआ करता।
कौन अपना, पराया है, भूल कर
सभी के कल्याण की इच्छा है रखता।
जय प्रकाश मिश्र
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