आज मैं उससे मिला... जो.. खुश कभी था,

मित्रों, जीवन एक निराला खेल होगा पर हम सभी इस कारण के मूल में हैं। अतिमहत्वाकांक्षा और हमारी स्वीकृत व्यवस्था भी कारण है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें, आनंद लें।

आज मैं उससे मिला...
अंधेरों... में, 
घर... है, जिसका...,
दुर्दिनों.. में, है... पड़ा! 
उदास... था! 
गमगीन... भी, क्या क्या कहूं! 
ऐ.. जिंदगी! 
हाल-ए-शिकवा.. गिला.., 
निज!  मित्र का।

आज.... 
मैं.., उससे.. मिला...
जो.. , खुश.. कभी था, फूल.. सा,
साथ था, हम.. सभी.. के, 
हम.., सभी... 
जैसा।

नजदीक.. से, 
देखा!  तुझे.. है, पास.. से,
ऐ..!! 
जिंदगी...! 
आवरण में सिल्क के,
और... नग्न.. भी..!  
पर, यहां पर.., तुम 
अलग... थीं
उस.., मित्र... में..
अंधेरों.... में 
सिसकती..
कुछ
कहती.. 
बस सोचती.., और...सोचती, फिर सोचती...।

घुटते.. हुए, 
घुटते हुए.., एक बार फिर... घुटते हुए! 
तोड़ते दम... 
उम्र.. की दहलीज पर...
अवस्था.. से, पहले..।
हे प्रिये!  
............
सत्य... है, 
ये.., 
व्यवस्था..... में आदमी की! 
सभ्यता...... में आदमी की! 
मान्यता...... में आदमी की! 
उस....जान को पिसते हुए! 
अवसाद को 
अवसाद के, आगोश में, गिरते....हुए।
देखा है मैने! 

मनुष्य... था, वह.., 
जन्म से...
पैदा हुआ था, उसी.. दिन
अन्न..पूर्णा... का 
दिन था,  
वो...
मुझे याद है..अच्छी तरह, 
सब.., कितने खुश थे... 
मेरे, मित्र.. के 
इस.. जन्म... से।

पुष्प.. से, लहरा.. रहे थे..
प्रसाद.....  है, 
परमात्मा.....  का! सभी.. तो! 
यह..!  कह... रहे थे! 

गीत... गाए, 
मां.., बहन.. ने,
समय के 'पर' वह चढ़ा।
पर, गिर... गया, 
बालक... वो कैसे! मेहनती था.।.
तेज था, नेक था, नम्र भी था, 
विशेष.. था।

एक, दौड़.. थी,
बस... नंबरों की, जिंदगी.. यह...
परीक्षा.. थी..
एक दिन.... की,  
जी... नहीं 
बस, कुछ.. घड़ी.. की।
जाने कैसे, क्या.. हुआ! 
मेरा मित्र! 
पीछे... रह गया...!

कुछ नंबरों का खेल था।
बस... और क्या? 
फिर...! 
कुछ.. नहीं...
वह, मोड... था.. 
उम्मीद... का, उस आदमी का।
ढह गया, गर्त में, 
फिर न.. उठा, तो, न.. उठा।

ढह गई उम्मीद.. नीचे 
जमीं ऊपर! 
और वह! 
बर्बाद..., होकर.. रह.. गया! 
आज.. मैं, उससे.. मिला.. 
अंधेरों... में, 
घर... है, जिसका...
दुर्दिनों.. में, है... पड़ा! 
उदास... था! 
गमगीन... भी, क्या करूं, ऐ... जिंदगी, 
तुझसे, मै... शिकवा गिला.. ।

एक सच कहूं! 
कोई सुनेगा! 
कोई!  
मत सुने, तो मत सुने...
मैं.. कहूंगा...! 

एक बगीचा.. था, 
अडभंग.. सा..
खुद.. ही, उगा.., खुद.. ही, पला..
जंगलों.. सा, अंधेरो... में, 
पास... ही, 
विविधता.. से भरा था..
पेड़ भी.. थे, लताएं थीं, फूल थे
सब... अटे से, एक संग 
पर, प्रफुल्लित थे।
बनफसे.. की, भीनी.. भीनी.. 
महक से
सब महकते.. थे, 
गुलज़ार था, अवसाद न था।
खिल खिलाते हंस रहे थे, 
जो मर रहे थे।
एक मुक्ति थी, आनंद था
जीवन वहां, छोटा तो था, पर मुक्त था।

सुंदर.. खिले थे, फूल 
प्रिय!  क्या.. रंग!  ले.. ले.. प्रकृति के
लताएं.. वन बल्लरी थीं,
जंगली, कुछ.. पुष्प थे।
फीके..भी थे, गहरे भी थे, 
कुछ, लाल, पीले, चटख नीले..
गुलाबी..., कुछ बांझ.. भी थे,
पर.. सभी... 'खुश' थे। 

सोचता हूँ, 
आदमी को देखकर! 
क्या नहीं, सब.. सुख से होंगे..
साथ.. मिलकर, 
बगीचों.. के पेड़ से।
आपस में सधकर, आपस में सजकर
सभ्यता के मोड पर इस कभी भी
खुश हो सकेंगे।

अवसाद भी क्या जरूरी है,
यंत्रणा, प्रताड़ना क्या नियति है? 
इस आदमी की..
जो जहां है परेशां है,
ये... ऐसा, क्यों है.. 
जैसे भी हैं, हम.., जहां.. भी हैं
जंगलों... से
लाल, पीले, हरे, नीले 
खुश क्यों नहीं हैं।

क्यों नहीं है,  
'खुश' वहां.. यह मित्र मेरा! 
जहां पर भी, आज वो है।
क्या कमी है, हम सभी में, सभ्यता में
हम क्यों दुखी हैं? 

जय प्रकाश मिश्र
प्रश्न: क्या आदमी, कभी.. एक आदमी बन कर इस पृथ्वी पर रहेगा, यह निजी संपत्ति जो विपत्ति का मूल है कभी विदा होगी। सभी आराम से समझदारी से मिलजुल आनंद से एक दिन तो रहेंगे। पर तब हम सभी बेइमान न होंगे।

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