केशुओं की कृष्णता से खेलती यह..

भाव: आदमी निरा भोजन और दवा से स्वस्थ नहीं हो सकता। हम जो स्वांस लेते हैं वह अति महत्व की है। जो पानी पीते है वह उससे और महत्व का है। और सबसे महत्वपूर्ण है शांत, हरीतिमा भरा स्वच्छ, साफ सुथरा वातावरण। और यह सब नेचर खुद करती है। हम अधिकतम पौधे लगाएं, बाग, जंगल और पहाड़ों की वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाएं तो हमें यह सब मुफ्त मिल सकता है। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।

ऑक्सी-रिच.... हवाएं, 

साफ.. निर्मल.., सदाएं

सुंदर.. हरीले  पेड़.. पौधे..

ये.. सब, 

हमे.. भी चाहिए! 

तो चलो.. हम आज ही 

पादप... लगाएं, प्यार.. से,

उसको..जिलाएं 

पुत्र... सा, 

आ.., मिल...सभी,

वृक्ष... सुंदर..., 

हरीला... उसको बनाएं।

आज का गीत...

चल, गीत गाऊँ, सुरभि.. का मैं, 

सुंदर है ये..

शीतल... बहुत है, पावनी हैं...

मंद, मन्द्रिल.. 

शिखर पर उस, पात ऊपर, 

बह रही है, गुनग़ुनाती जा रही ।


लहर लेकर.. पुष्प के संग.. 

नाचती है, चूमती है

दूर है.. हर व्यथा से यह..

मुस्कुराती.. स्नेह भरती 

जा रही है।


केशुओं की कृष्णता से खेलती है.. 

छू रही है, अनछुए 

अधरोष्ठ.. को 

उन..., 

मासूम सी, उस बालिका के, 

प्यार.. से, दुलार से..

गीत सुंदर, पत्तियों संग गा रही है।


तिर.. रही है, पंछियों.. संग 

गगन में.. यह

"पर" पर चढ़ी, ओंकार.. मध्यम 

योगियों.. का गीत, सुंदर, गा रही है।


तरल हैं, यह सरल हैं, 

सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं,

जीवन लिए है, हाथ में... 

विचरती....

जीव... में, हर, 

प्राण... भरती जा रही है।


गुजरती है, बनो से, 

उपवनों... से, बगीचों... से

पर्वतों.. से, घाटियों.. से, 

उठाती है, ऑक्सीजन हाथ में, 

जीवनी यह, साथ में, 

भरती यहां से... ।

फिर बांटती है 

मानवों के घरों में, पंछियों के परों.. में 

उन पंछियों के घोंसलों में, 

चातकों के, बालकों में...

जलों में उन मछलियों में, प्राणियों में

प्यार से.., मुफ्त ही, 

हर रोज... प्रातः

प्रसन्नता से.. दान देती जा रही हैं।


एक... हम हैं, 

निचोड़ते.. हैं, रस.. इसी का

काटते.. हैं, इसी को..

स्वार्थ छोटा देखते हैं, मात्र.. अपना

वध... कर रहे हैं इसी का।

गंध देते हैं इसे... सोचो जरा! 

हम कैसी कैसी... 

रसायन कितने विकट हम छिड़कते हैं

इसके ऊपर...

जल रही हैं, गर्मियों से, रसायनों से

तेरे पाप से, तेरी बेरुखी से

क्या करे यह, 

चुप हैं, ये...सच!  सभ्य.. हैं! 

कुछ बोलती तक है नहीं..

देख न..., अब,  रुग्ण.. है 

यह हो गई..

चाल इसकी बहुत धीमी हो गई..

थक गई, रुक गई, दूर हमसे हो रहीं.


इसलिए तो कह रहा हूँ, 

अगर जीना है तुम्हे!  

तुम, पेड़ कुछ, अब भी लगाओ

बगीचों में, पार्क में, सड़क ऊपर

स्वस्थ हो जाएगी ये, 

हम सभी के सम्मिलित प्रयास से।

सच! हम सभी के सम्मिलित प्रयास से।

जय प्रकाश मिश्र



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