आ…तुझे मैं, अलग कर दूं..
मित्रों, दुनियां में आ के ऐसे खोए की आखिरी रात तक होश ही नहीं रहा, मूल स्वभाव और मूल कार्य ही भूल गए। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए, पढ़ें और आनंद लें।
आ…तुझे
मैं, अलग कर दूं..
आज तेरी.., धूल.. से,
चिपकी हुई है.., जाने कबसे
किस तरह, अपनेपने से।
देख तो..,
तूं एक होकर.. बीच में
इस धूल के..
फंस गया है, हाय! कैसे…
आख़िर कभी तो, आके मिल
खुद आप से।
छुप गया, प्रासाद में तूं,
बस… गया.. छाया तले..,
देख तो.. दुनियां रसीली..
महल से, बाहर निकल के।
इधर है, इस चिलचिलाती
धूप.. में, इस तपन… में,
तपस्या के बीच में,
करुणामयी इन मूर्तियों के बीच में।
आ... किसी दिन, खेत... में
सुन..! घंटियां, बजती हुई,
लय ताल में इस बैल के
गले से लटकी हुईं
कुछ कह रही हैं, बस तुम्ही से।
देख कैसे झूमते हैं
रस ये अपने, काम में
भूल जाते है सभी कुछ
मस्त रहते आप में।
जय प्रकाश मिश्र
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