चंदन.. शीतल, काया उनकी

मित्रों, नवरात्रि में सबकुछ शिवात्मिका शक्ति से सराबोर है। शिव भोले और शक्ति एक ही हैं अर्धनारीश्वर उनका रूप है। आप, आज भोले बाबा पर थोड़ी सी पंक्तियां आदर सहित पढ़ें और आनंद लें।


बाबा…! 

मोरो.. इंद्रधनुष.. सतरंगी.., 

कब.. दीखें, कब.. प्रकृति लयी.. हों

सहज.., सुघड़.., अडभंगी..।

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी..।


चंदन.. शीतल, काया उनकी

श्वेत, चंपई.. रंग की,

बहुराहें, बाउरि.., बौरहवा.. 

सारे.., उनके.. संगी…।

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी…।


अनमन.. दीखत.., अनमनि-वस्था.. 

चेतन, जागृत.., मन की

सकल डो..रि, बां..धे.. घू..मत हैं

करत.. हैं, अपने.. मन की।

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी…।


अवघर.. दानी, ’मान’ न.. जानैं 

शिशु.. सम हंसंय, 

कला.. 

सब जानैंय..। 

चौंसठ.. योगिनि, के संग नाचैंय....

नाच…’भैरवी, 

रव.. की…।

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी…।


आनंद.. ढरकै, 

बहै…., रस.. गागरि!  

डम डम डमरू बहुत निक लागय! 

सरल.., सुखद.. मनमौजी..।

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी…।


निक.. नेऊरि.. कै, भेद.. न जानैयं 

साटैं अनगिन, थाह न पावैं,

पाप, पुन्य सब… शीश नवावै

रस.., सरसै.. बहुरंगी…

बाबा…! मोरो..  

इंद्रधनुष... सतरंगी…।


जय प्रकाश मिश्र



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