सृष्टि से भी मिल लिया मैं,

मित्रों: ईश्वर हर कण हर वस्तु में हर क्षण अवस्थित है। उनका दर्शन उनकी कृतियों में कर आनंद लेना चाहिए। इसी पर संक्षिप्त रस मंजरी आप के लिए।

एक् फूल.. देखा ! 
सहज.. सुंदर...
डालियों 
पर..
मुस्कुराता.. 
नवल! छवि.. लय! 
खिल.. खिलाता, इठल करता..
मधुर..., मधुमय...।
 
देख.. उसको, खिल.. गया, मैं....।
साथ उसके.. 
उसी.. में...
दर्शन... किया, 
उस.. विधाता.. का, 
विधाता... से, एक तरह प्रिय! 
मिल... लिया, मैं...।

कैसी नमी.., लावण्य.. कैसा! 
सादगी, अज़्बो.. ग़ज़ब!  
सब कुछ बनाया 
विधाता का.. 
समझ... 
आया, 
रीझ कर.. उन विधाता की कृति पर,
आनंद से भी, मिल लिया, मैं..।

एक् फूल से मिल!  
गौर..., से.. 
देखा.. 
उसे...
अपने पने से, पास... से, 
मुक्त.. मन से, राग से, विराग ले!  
समझ कर, 
परफेक्टनेस..., 
उनकी बनाई, चीज... में, 
हर... चीज से ही, मिल लिया, मैं...।

वह 'एक' है, 
एक ही... 'कारीगरी' है
हर, जगह...
कारीगरी को समझ कर...
फैली हुई, 
इस.. लहलहाती... 
सृष्टि से भी मिल लिया, मैं...।


तुम भी मिलो! 
उस.., विधाता.. से 
सत्य.. देखो! 
एक है, 
एक है, वह...! 
विविधता में, विश्व की
जीव... में, हर। 

संतुष्ट.. हूँ, सामान्य.. हूँ, 
अब....
शांत.. हूँ, 
कलाएं, कल्पनाएं, विधाएं, 
सारी.. सदाएं, 
राज... 
उसके, जानकर...! 
हर रोज मिलता, हूँ उसे...
इन सभी में, 
उनकी बनाई सृष्टि में 
सच कहूं, हूं!  बहुत खुश मैं,
बहुत.. खुश मैं ।

जय प्रकाश मिश्र


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