कौन सा वह द्वार.. है
मित्रो, जीवन स्थितियों का एक खजाना है, और विशिष्ट अनुभूतियां यहीं मिलती है। एक द्वार या एक बदला हुआ दृष्टिकोण पैदा हो जाता है जब हम नितांत अंतिम रूप से रिस्क ले जीवन से गुजरते हैं। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।
कौन सा वह द्वार है,
विकल करता
है, मुझे....
संवेदना.. में, डुबाता.. है,
मित्र सबके....।
विकल करता
है, मुझे....
संवेदना.. में, डुबाता.. है,
मित्र सबके....।
कोई भावना... है,
ज्ञान.. है,
कर्तव्यता... है,
सीज़ कर, पसीज कर, भीतर प्रिये!
सीज़ कर, पसीज कर, भीतर प्रिये!
मैं भीग.. जाता, प्रेम... मे ।
करुणा..!
मुझे, क्यों..
घेर... लेती, घेर..,
अपने... 'बाजुओं' में,
क्यों तैरता हूँ, सागरो... में,
कष्ट.. के।
क्यों तैरता हूँ, सागरो... में,
कष्ट.. के।
बैठा यहीं, इस पार, नद.. के,
पार... उस
उस.. पार, नद.. के..
बस.... रहे,
उन जंतुओं... के,
जीवनों.. के, बीच.. मैं।
मैं.. रह रहा हूँ,
बंध... रहा हूँ
कल्पना.. की, डोर...
उनकी.... मुश्किलों मैं।
कौन सा वह... 'द्वार' है,
विकल... करता है, मुझे....
संवेदना में,
डुबाता है, मित्र सबके....।
जानता हूँ! सब एक है...
एक ही 'वह'
हर... जगह... है।
श्वान में, मनुष्य में, चांडाल में!
फिर,
भेद.. क्यों है?
लबादा.. है? आदतें.. है?
सोच.. है?
यह वेश... है, रंग, रूप है
क्या भावना की
कमी... है,
कर्म का सिद्धांत कोई?
आखिर वो क्या है...?
सब.., अलग.. क्यों हैं ?
एक हैं..
तो...,
क्यों, एक, न... हैं!
क्यों भागता, दुत्कारता यह स्वयं को है,
प्रिय, मुझे..तो, भ्रम.. यही है।
वह, सत्य है!
तो एक होगा! अनेक क्यों है?
मेरी 'दृष्टि'...
भोथी.., बहुत मोटी...
हो... गई है,
ज्ञान.. से, विज्ञान से,
लोक के व्यवहार से, प्रिय! पुष्ट होकर!
दीख़ता मुझको नहीं है,
सत्य.. प्रिय!
मैं... क्या करूं!
उजाला... है, हर तरफ,
यह.. चमकता... चमचम चमाचम
आंख, खुलती.. ही, नहीं... है।
बंद.. है,
मैं.. क्या करूं,
आवरण... है, बहुत.. गहरा !
स्वार्थ का, परमार्थ का,
इन दृष्टियों पर
एक क्षण हटती नहीं है।
क्या करूं!
सामान्य है 'सच'
पर छुप.... गया, है
इन सुनहरी, स्वर्ण निर्मित, झाड़ियों में
विभ्रमित मैं!
एक वाक्य था मैने पढ़ा...
कहीं वेद में,
"हिरण्य मयेन पात्रेन सत्यस्य पीहितम मुखम"
क्या इसलिए.. सत्य वह
दीखता....
मुझको.... नहीं है।
स्वर्ण की, इस चमक में,
सब छुप.. गया है
क्या करूं!
मैं,
सामान्य स्वाभाविक प्रिये!
दीखता
मुझको नहीं है,
चिंतन, मनन, संग.. ज्ञान धन,
सब, चुक.. गया है,
आज अब..
बंद है हर रास्ता..,
कोइ रास्ता! मिलता नहीं है
विकल है मन, क्या करूं!
प्रिय मात्र है अब, 'समर्पण'! अरु 'समर्पण'!
क्या! यहां..
कोई, हाथ.. होगा
जो थाम लेगा, हाथ मेरा..
हाथ.... अपने, मुक्त मन, तन...
मिला लेगा, भान ले,
मेरा समर्पण!
अपनी परिधि में, वृहत्तम।
समर्पण ही द्वार है, वह बैरियर है
बुद्ध का, मैत्रेय का, हर
सुलझे हुए का,
हारे हुए,
अभिजात का, अवजात का,
हर किसी का
मित्र मिलता है यहीं,
वह जोहता
प्रिय! बाट.. तेरी...
बाट मेंरी,
अंत है जो हर
खुशी का, हर ग़मो का।
संसार के, सम्बन्ध का, झूठे भ्रमों का।
जय प्रकाश मिश्र
कौन सा वह द्वार है, विकल करता
है, मुझे....
संवेदना.. में, डुबाता.. है,
मित्र सबके....,
कोई भावना है, ज्ञान है, कर्तव्यता है,
भीग जाता हूँ प्रिये! मैं....,
प्रेम... में।
करुणा..!
मुझे, क्यों..! घेर... लेती,
घेर..,
अपने 'बाजुओं' में,
क्यों तैरता हूँ, सागरो... में, कष्ट.. के,
बैठा यहीं, इस पार, नद.. के,
पार... उस
उस.. पार, नद.. के..
बस रहे, उन जंतुओं के,
जीवनों के, बीच.. में।
मैं.. रह रहा हूँ, बंध रहा हूँ
कल्पना.. की, डोर... सबकी मुश्किलों में।
कौन सा वह... 'द्वार' है,
विकल... करता है, मुझे....
संवेदना में, डुबाता है, मित्र सबके....।
जानता हूँ! सब एक है...
एक ही 'वह'
हर... जगह... है।
श्वान में, मनुष्य में, चांडाल में!
फिर,
भेद.. क्यों है?
लबादा.. है? आदतें.. है? सोच.. है?
वेश... है,
भावना की कमी है, कर्म का सिद्धांत है?
आखिर वो क्या है...,
सब.., अलग.. क्यों है?
एक है..
तो...,
क्यों? एक, न... है!
क्यों भागता, दुत्कारता वह स्वयं को है,
प्रिय, मुझे..तो, भ्रम.. यही है।
वह, सत्य है!
तो एक होगा! अनेक क्यों है?
मेरी 'दृष्टि'...
भोथी.., बहुत मोटी...
हो... गई है
ज्ञान.. से, विज्ञान से, लोक के व्यवहार से
दीख़ता मुझको नहीं है, सत्य.. प्रिय!
मैं क्या करूं!
उजाला... है, हर तरफ, यह.. चमकता...
आंख ही, खुलती.. नहीं है
बंद.. है,
मैं.. क्या करूं, आवरण है, बहुत गहरा !
स्वार्थ का, परमार्थ का,
इन दृष्टियों पर
एक क्षण हटती नहीं है
क्या करूं!
सामान्य है 'सच' पर छुप गया,
इन सुनहरी, स्वर्ण निर्मित, झाड़ियों में
क्या... करूं! मैं विभ्रमित हूँ!
एक वाक्य था मैने पढ़ा...
कहीं वेद में,
"हिरण्य मयेन पात्रेन सत्यस्य पीहितम मुखम"
कुछ दीखता मुझको नहीं है,
स्वर्ण की, इस चमक में, सब छुप.. गया है
मैं क्या करूं!
कुछ दीखता मुझको नहीं है,
चिंतन, मनन, संग.. ज्ञान धन,
सब, चुक.. गया है,
आज अब..
बंद है हर रास्ता..,
कोइ रास्ता! मिलता नहीं है
विकल है मन, क्या करूं!
प्रिय मात्र है अब, 'समर्पण'! अरु 'समर्पण'!।
क्या! यहां.. कोई, हाथ.. होगा
थाम लेगा, हाथ मेरा..
हाथ अपने, मुक्त मन, मुक्त तन
में.....मिला लेगा, भान ले
मेरा समर्पण!
यह समर्पण ही द्वार है, वह बैरियर है
बुद्ध का, मैत्रेय का, हर
सुलझे हुए का,
हारे हुए,
अभिजात का, अवजात का, हर किसी का
मित्र मिलता है यहीं, वह जोहता
प्रिय! बाट.. तेरी...
बाट तेरी,
अंत है जो हर
खुशी का, हर ग़मो का।
संसार के, सम्बन्ध का, झूठे भ्रमों का।
जय प्रकाश मिश्र
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