एक दुनियां यहीं है, दुनियां में इस,
मित्रों, आज की लाइने समाज के सबसे कमजोर तपके को समर्पित! आप भी पढ़ें और आनंद लें।
एक दुनियां यहीं है, दुनियां में इस,
एक् लोक है, सूखा... हुआ,
निर्वस्त्र... ही!
कुछ... अलग है, दुनियां से इस,
भयावना.....!
लोलता.. रूप में,
स्निग्धता
चमड़ियों पर शून्य ही।
यथार्थ का, अनुराग का, प्रिय! नग्न ही।
चादर नहीं है,
पास इनके, ओढ.. लें,
कुछ छुपा लें, आड कर लें,
जिंदगी!
कपड़े नहीं... हैं,
बनावटी..., रंगीन खिलते... रंग, के...
फीके.. सभी, बे.. ढंग के...
आकार में प्रकार में।
ऐ जिंदगी!
वे पहन.. लें, कुछ खुला है, तो खुला है!
कुछ ढका है, तो ढका है!
बे-खबर! सब,
क्या?
दुख.... ! रहा है
क्या? दिख...! रहा है, जिंदगी!
चोर नजरें नहीं हैं, इस लोक में,
जो, झांकती हैं,
पास के भी घरों... में,
फटते हुए उन स्तनों के वस्त्र में,
कुछ ना छुपा है,
सब, सत्य.. है, जो कुछ जहां.. है
कुछ... नहीं, कितना.. भी हो,
किसी ने...,
न, ढका... है।
एक, सत्य है, उघड़ा यहां,
हर ओर फैला,
फुर्सत नहीं है, छुपाने की,
सभ्य सी...।
दिन नहीं निकला
अभी,
रात... ही... है, ऊषा कहां है
इनको, पता... क्या?
अमावस की रात सी है, जिंदगी
हर रोज इनकी...
सच सुनो!
तैयार हैं सब, तैयार भोजन!
दोपहर का, रख चुके हैं,
बंद डिब्बे कर चुके है,
निकलने की, हर जगह
हर किसी को, जल्दी... मची है।
काम पर, सब जाएंगे,
रात तक, फिर
आएंगे, छोड़ बच्चे बच्चियां,
छोटी.. बड़ी...,।
स्कूल!
स्कूल.. क्या है?
जरूरत... भी, क्या... है?
नौकरी..., बिन पढ़ें की ही, है... भली!
चार पैसे कमा लेगा,
दम साध कर, मेहनत... करेगा।
एक दुध मुहां है
रो रहा है, बत्ती नहीं है,
उमस... है, मच्छरों के बीच कोई सो रहा है,
खड़ खड़ाखड़ मच रही हो,
कितनी... भी
नींद से
मतलब भी... क्या है!
लोक है यह, धरा पर इस! हर जगह
जहां रहते काम वाले, मित्र अपने
उन्ह सब जगह! पर
देख अब तुम कभी!
अतिशयोक्ति
क्या है।
तैरता है दर्द हल्का, हर... आंख में,
भूख है, जरूरत
सुबह फ्रेश की
दब.. गई, नंबर लगा है, वह चुप खड़ा है।
हैं, उलझने...
दास्तानें....,
जिंदगी.... की,
कब्र... में
सब.. दब... रहीं।
कुछ नहीं है चमकता, ना
चमकती.... है
जिंदगी....।
लोग हैं, अंजान सच!
एक दूसरे से..
दूर.. के।
एक् लोक है, सूखा... हुआ,
निर्वस्त्र... ही।
कुछ... अलग है,
दुनियां से इस, भयावना..!
लोलता.. रूप में, स्निग्धता
चमड़ियों पर
शून्य ही।
यथार्थ का, अनुराग का, प्रिय! नग्न ही।
चादर नहीं है,
पास इनके, ओढ.. लें।
जय प्रकाश मिश्र
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