सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के,
बुनता रहा मैं जिंदगी दिन रात लग के, लगन से, अंत में सब.. कुछ न! निकला.. सामने मेरे.. सवाल ही थे। इसलिए... प्रिय! क्या विधा है, क्या कहूँ, यह जिंदगी! काढ़ता हूँ फूल कलियां! कैनवस पर, जब कभी झाँकती.. हैं... पत्तियां मुझे बुलातीं, हिलती हुई, अंदर कहीं। रुक हूँ जाता, काम से, कई बार मैं यह सोचता.. जीवन खिलेगा, पक्का है ये.. सभी का इस काम से, पर डर हूँ जाता देखकर मैं इरादा, आज के इस आदमी का। हर क्षण बदलता तुच्छ से किसी स्वार्थ में मुझे ना भरोसा.. वरदान को, इस रेशमी फैब्रिक्स को यह कफ़न जैसा ओढ़ न ले। सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के, तिकड़मों, तकनीक से, नए उद्यमों, नई नीति से पा रहा हूं दूर.. खुद से, स्वास्थ्य.. से आज अपनी, मरीचिका के क्षेत्र में। संवारता हूँ भविष्य अपना आज जितना.. सोचकर नजदीक उतना पहुँचता हूँ, आदमी के, आप के.. संहार के। क्या विधा है, क्या कहूँ, यह जिंदगी! काढ़ता हूँ फ...