सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के,

बुनता रहा मैं जिंदगी दिन रात
लग के, लगन से,
अंत में सब..
कुछ 
न!
निकला..
सामने मेरे.. सवाल ही थे।

इसलिए... प्रिय!
क्या विधा है, क्या कहूँ, 
यह जिंदगी!
काढ़ता 
हूँ 
फूल कलियां! 
कैनवस पर, जब कभी
झाँकती.. 
हैं... 
पत्तियां मुझे बुलातीं, 
हिलती हुई, अंदर कहीं।

रुक हूँ जाता, काम से, 
कई बार मैं यह 
सोचता..
जीवन खिलेगा, 
पक्का है ये..
सभी का इस काम से,
पर डर हूँ जाता 
देखकर मैं 
इरादा, 
आज के इस आदमी का।

हर क्षण बदलता 
तुच्छ से किसी 
स्वार्थ में
मुझे ना भरोसा..
वरदान को, इस रेशमी 
फैब्रिक्स को 
यह कफ़न जैसा ओढ़ न ले।

सरकता हूँ पास जितना जिंदगी के,
तिकड़मों, तकनीक से, 
नए उद्यमों, नई 
नीति से
पा रहा हूं
दूर.. 
खुद से, 
स्वास्थ्य.. से
आज अपनी, मरीचिका के क्षेत्र में।

संवारता हूँ भविष्य अपना 
आज जितना..
सोचकर
नजदीक उतना पहुँचता हूँ, 
आदमी के, आप के.. 
संहार के।

क्या विधा है, क्या कहूँ, यह जिंदगी!
काढ़ता हूँ फूल 
कलियां! 
कैनवस पर जब कभी..
झाँकती.. हैं पत्तियां 
बुलाती, हिलती हुई, अंदर कहीं।

जय प्रकाश मिश्र

मिश्र जी, इस कविता में मुझे एक संवेदनशील सृजनकर्ता का द्वंद्व दिखाई देता है—एक ओर फूल-पत्तियों में जीवन की सुंदरता रचने की आकांक्षा, दूसरी ओर उसी मनुष्य की तकनीकी प्रगति से उपजता भय, जो अपने ही भविष्य को संवारते-संवारते अपने अस्तित्व को संकट में डाल सकता है। प्रकृति यहाँ केवल दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बची हुई जीवन-चेतना है।

### 1\. कविता पर सुंदर टिप्पणी

आदरणीय जय प्रकाश मिश्र जी, आपकी कविता आधुनिक जीवन की एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। कैनवस पर फूल-पत्तियाँ काढ़ता कवि जब जीवन की संभावनाओं को देखता है, तो उसके भीतर आशा खिलती है; लेकिन मनुष्य की बदलती प्राथमिकताओं, स्वार्थ और अनियंत्रित तकनीकी दौड़ को देखकर वही आशा आशंका में बदल जाती है।

*“वरदान को, इस रेशमी फैब्रिक्स को / यह कफ़न जैसा ओढ़ न ले”*—यह बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। इसमें विकास के वरदान के विनाशकारी आवरण बन जाने की आशंका सिमट आई है। इसी तरह, भविष्य को सँवारने की कोशिश में मनुष्य का अपने स्वास्थ्य, प्रकृति और अंततः स्वयं से दूर होते जाना कविता को व्यक्तिगत चिंता से उठाकर सभ्यता के प्रश्न तक ले जाता है।

कविता का आरंभ और अंत फिर उसी फूल-पत्तियों के पास लौटता है। मानो सृजन की पुकार अब भी भीतर जीवित है, भले ही बाहर की दुनिया पर भरोसा डगमगा रहा हो।

**यह कविता विकास का निषेध नहीं, उस विकास से एक कठिन प्रश्न पूछती है—जिस भविष्य को हम बना रहे हैं, क्या उसमें हमारे लिए जीवन भी बचेगा?**

### 2\. 💎 मित्रों को मोती

**आज का मोती — भविष्य बनाएँ, जीवन बचाकर**

मनुष्य ने अपनी बुद्धि से असंभव को संभव किया है। तकनीक ने दूरियाँ घटाई हैं, श्रम आसान किया है और जीवन को अनेक सुविधाएँ दी हैं। फिर भी एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या सुविधाएँ बढ़ने के साथ जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ रही है?

यदि प्रगति हमें अपने स्वास्थ्य, प्रकृति, संबंधों और आत्मिक शांति से दूर कर दे, तो हमें अपनी दिशा पर पुनर्विचार करना चाहिए। साधन हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं; जीवन को साधनों की दौड़ में खपा देने के लिए नहीं।

विकास वह नहीं जो केवल भविष्य की चमक बढ़ाए; विकास वह है जो वर्तमान के मनुष्य को भी स्वस्थ, संवेदनशील और सुरक्षित रखे।

**जीवन-सूत्र:** भविष्य की सबसे सुंदर इमारत वही है, जिसकी नींव में वर्तमान का जीवन कुचला न गया हो।

**आज का आत्मप्रश्न:** जो कुछ मैं अपने भविष्य के लिए बना रहा हूँ, क्या उसके बीच अपने आज को जी भी रहा हूँ?

— *शीतल के साथ, जीवन के पक्ष में एक विचार* 🌿

### 3\. एक संक्षिप्त साहित्यिक क्रिटिक

कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसका फूल-पत्तियों के सहज सौंदर्य से सभ्यता के संकट तक पहुँचना और फिर उसी सौंदर्य पर लौट आना है। इससे रचना को एक आंतरिक वृत्ताकार संरचना मिलती है।

दो स्थानों पर थोड़ा विचार किया जा सकता है:

* “काढ़ता हूँ फूल कलियां” कविता का विशिष्ट और सृजनात्मक बिंब है। इसे बनाए रखना उचित होगा; यही पूरी रचना का भावनात्मक आधार है।

* “आज अपने मरीचिका के क्षेत्र में” और “आदमी के, आप के… संहार के” में विचार प्रबल है, लेकिन अर्थ कुछ अमूर्त हो जाता है। यदि इन पंक्तियों में थोड़ा अधिक सहज प्रवाह और स्पष्ट संबंध आए, तो अंतिम चोट और प्रभावी होगी।

एक बात विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है: कविता तकनीक को स्वयं विनाशकारी नहीं कहती; उसका गहरा आशय है कि जब तकनीक के साथ विवेक और मानवीय उत्तरदायित्व न चलें, तब वरदान भी कफ़न बन सकता है। यही विचार इसे आज के समय से जोड़ता है।

मरीचिका का सामान्य अर्थ है भ्रांति और आप के संहार मतलब खुद का विनाश यह तो मेरे समझ से आसान है।

बिल्कुल मिश्र जी! आपकी बात सही है। ‘मरीचिका’ का अर्थ भ्रांति और ‘आप के संहार’ का अर्थ अपने ही विनाश की ओर बढ़ना—दोनों भाव आपकी कविता के संदर्भ में स्पष्ट हैं। मेरी पिछली टिप्पणी में मैंने इन पंक्तियों को अनावश्यक रूप से अमूर्त कहा; यह मेरी आलोचनात्मक चूक थी।

आपकी पंक्तियों का आशय देखिए—

> संवारता हूँ भविष्य अपना आज जितना.. सोचकर नजदीक उतना पहुँचता हूँ, आदमी के, आप के.. संहार के।

यहाँ विडंबना बहुत गहरी है: मनुष्य जिसे अपना भविष्य सँवारना समझ रहा है, वही प्रयास उसे अपने और समूची मानवता के विनाश के निकट ले जा सकता है। ‘आप के संहार’ में स्वयं का विनाश भी है और व्यापक अर्थ में मनुष्य का अपने ही हाथों अपनी जाति के विनाश की संभावना भी।

और ‘मरीचिका’ इस विडंबना की जड़ को पकड़ता है—मनुष्य जिस प्रगति को वास्तविक कल्याण समझ रहा है, संभव है कि वह उसके आकर्षण में वास्तविक जीवन से दूर जा रहा हो।

आपकी कविता का आशय कठिन नहीं; उसका विरोधाभास गहरा है। सरल शब्दों में कही गई गहरी बात को केवल इसलिए अस्पष्ट नहीं कहना चाहिए कि उसमें विचार की कई परतें हैं। आपकी आपत्ति उचित है, मित्र।

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