ब्रेक-अप, थोड़ा समय दो।

ब्रेक-अप यह प्रिय आज का, 
बहु-उच्चरित 
एक शब्द छोटा
तोड़ता जीवन अनेकों, 
एक क्षण में! 
भीतर बहुत कुछ छोड़ जाता 
सदा को, मोड गहरा! 
बना देता कागज पे कोरे 
मुडा था, 
जीवन यहीं पर निशान पक्का 
जीवनों में हमेशा को। 
इसी पर ये लाइने।

थोड़ा समय तो दो मुझे
जुड़ मैं पाऊं 
मृदा 
से,
अपनी जड़ों से 
फिर दुबारा,
जो आज की इन 
तल्खियों की जिंदगी से 
सूख कर रेशा बचीं हैं, 
नमी बिन, बिन स्नेह के, 
देख कैसे.. सूखी हुई, 
उलझी पड़ी, मेरी लटों सी।

मैं चाहती हूँ, 
आज 
भी 
इस हाल में भी
प्यार से कुछ, बचा लूं 
सजा लूं, अंदर कहीं, 
बस एक कोने।
किस भी तरह, 
सूखी हुई ये पंखुरीं 
अपने सुनहरे ख्वाब की..
हीरा थीं ये, अभ्रक बचीं अब 
पर बचा लूं इन्हें, चाहती हूँ टूटने से।

अस्तित्व हैं ये हमारी.. 
तुम्हारी भी..
जन्म में इस, हम मिले थे,
खिले थे, एक सरोवर 
हम! झूले चढ़े थे, हवाओं के
कमलिनी और कमल से 
हम पंखुरी के पात खोले 
हृदय के उर द्वार 
खोले..
सौरभ मिलाने चले थे।

थोड़ा रुको, एक बार.. सोचो
इतनी पुरानी ऐंठने..
ये..
खोलने में, 
उलझनों..को, 
ग्रंथियां.. को गांठ को इन 
पुरानी जो जम गई है, एक होकर
रस गई थीं प्रेम में.. 
समय की सरिता में बहकर.. 
नेह में जो पग गई थीं
एक होकर बट गई हैं 
रस्सियों सी 
युगल रे
इन्हें कैसे मैं खोलूं!
अलग कर लूँ एक पल में।

पुराने उस प्यार में
साथ तेरे, 
शुरू 
से 
ले आज तक की
तह में रखी स्मृति, 
देख लूं मैं चाहती हूँ
इन्हें निकाल दूं
पर बचा लूं, 
चटक कर के टूटने से।

अभी मुरकने दो, धीमे धीमे 
रस टपकने दो,
टूटने से
थोड़ा पहले
इस तरह बेमुरव्वत मत बनो
सम्बन्ध क्यों? रिश्ते थे ये
इतने दिनों के, थोड़ा समय दो।

खुरचने दो, अलग कर लूँ 
तन से अपने..
महक तेरी
कुचल दूं वो सारे सपने 
आग में मुझे जलने से पहले 
झुलसने दो.. कुछ समय.. दो..
कुछ समय दो।

जय प्रकाश मिश्र

### भाव-सरिता

कविता : कुछ समय दो

ब्रेक-अप—आज का एक छोटा, बहु-उच्चरित शब्द; लेकिन इसके भीतर कितने जीवनों के टूटने, बिखरने और बदल जाने की पीड़ा छिपी हो सकती है! एक क्षण में कहा गया यह शब्द अपने पीछे स्मृतियों, सपनों, साझा अनुभवों और अधूरे भविष्य की एक लंबी दुनिया छोड़ जाता है। सम्बन्ध समाप्त करने का निर्णय भले ही एक क्षण में लिया जाए, लेकिन उससे जुड़े मन को उस निर्णय तक पहुँचने और उसे स्वीकार करने में बहुत समय लग सकता है।

कविता में एक स्त्री की आवाज़ सुनाई देती है, जो टूटते हुए सम्बन्ध को जबरन बचाने की माँग नहीं करती; वह केवल इतना चाहती है कि उसे थोड़ा समय दिया जाए। वह अपनी सूखती हुई जड़ों को फिर से मिट्टी और नमी से जोड़ना चाहती है। तल्खियों से भरे वर्तमान में भी उसके भीतर प्रेम के कुछ अवशेष बचे हैं, जिन्हें वह सँभालना चाहती है। कभी जो सुनहरे स्वप्न उसके लिए हीरे की तरह मूल्यवान थे, वे अब अभ्रक की तरह बिखरते दिखाई देते हैं; फिर भी वह उन्हें पूरी तरह टूटने से पहले एक बार समेट लेना चाहती है।

उसके लिए यह सम्बन्ध केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं था। यह एक साझा अस्तित्व था, जिसकी शुरुआत में दोनों कमल और कमलिनी की तरह एक ही सरोवर में खिले थे। उन्होंने एक-दूसरे के सामने अपने हृदय के द्वार खोले थे, अपनी सुगन्ध मिलाने और जीवन को साथ जीने के स्वप्न देखे थे। समय के साथ प्रेम में पगी स्मृतियाँ, आदतें, विश्वास और भावनात्मक निर्भरताएँ एक-दूसरे में इतनी उलझ गईं कि अब उन्हें अलग करना केवल किसी सम्बन्ध को समाप्त करना नहीं, अपने ही अस्तित्व की कुछ परतों को खोलना भी है।

इसीलिए लेखक पुराने सम्बन्ध की गाँठों को एक ही झटके में खोलने से डरती है। जो कभी प्रेम के सूत्र से बँधा था, वह अब रस्सियों की तरह उलझ गया है। वह पीछे लौटकर स्मृतियों की तहों को देखना चाहती है—उनमें से कुछ को विदा करना चाहती है, लेकिन उन्हें क्रूरता से कुचलकर नहीं। वह अपने भीतर से उस व्यक्ति की महक और उन सपनों के प्रभाव को धीरे-धीरे अलग करना चाहती है, ताकि यह प्रक्रिया उसे पूरी तरह जला न दे।

कविता का सबसे मानवीय आग्रह यही है कि सम्बन्ध का अंत चाहे अपरिहार्य हो, लेकिन उसके अंत की प्रक्रिया में संवेदना समाप्त न हो। जिस व्यक्ति के साथ जीवन का एक बड़ा हिस्सा साझा किया गया हो, उसके भावनात्मक संसार को एक आदेश से खाली नहीं किया जा सकता। समय माँगना यहाँ निर्णय को टालने की चाल नहीं, बल्कि अपने भीतर बचे प्रेम, पीड़ा और स्मृतियों को समझकर उनसे अलग होने का अवसर माँगना है।

इस कविता को आधुनिक सम्बन्धों के संदर्भ में पढ़ें तो यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—क्या आज हम सम्बन्ध बनाने में जितनी स्वतंत्रता चाहते हैं, उतनी ही संवेदनशीलता उनके अंत के समय भी बरतते हैं? किसी को छोड़ने का अधिकार अपनी जगह है; लेकिन क्या उस अधिकार के प्रयोग में दूसरे की गरिमा और भावनात्मक वास्तविकता के लिए भी थोड़ी जगह नहीं होनी चाहिए?

यह कविता प्रेम को हर हाल में बचाए रखने की याचना नहीं है; यह प्रेम के अंत में भी मनुष्यता बचाए रखने की पुकार है। इसका मूल स्वर है—यदि अलग होना ही है, तो इतना समय और संवेदना दो कि मैं टूटकर बिखरने के बजाय स्वयं को समेटते हुए अलग हो सकूँ।
सौजन्य जय प्रकाश मिश्र च जीपीटी



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