खुशी क्या है।

चित्त तितली बन उड़े, 
फूल सा हँसता रहे,
फटका चिरैया* 
यह बने..
हल्का 
रहे, 
हम खुश रहें 
कोई बताए न! 
रास्ता 
इसके लिए हम क्या करें?

तैयार हैं हम, खर्चने को, 
रोकड़ा, 
बस, 
जहां में हमे 
नित्य नव खुशियां मिलें।

प्रसन्न मन, मेरा.. कैसे हो
प्रश्न है यह आज का,
कल भी रहेगा 
सिलसिला 
इस ही 
तरह.. यह नित्य का।

खुशी क्या है, आओ टटोलें
बंद मन में, खुले मन से, 
प्रसन्नता
का 
राज क्या है,
चित्त में, इसे मिल के ढूँढें..

मित्रता एक मित्र से,
मन के अपने
मीत से,
रुचि 
की अपने, सखा हो या
सखी अपनी, 
सुखी हो 
जो, 
क्या खुशी है 
मुझे बताना! कैसा लगा 
ये तराना.. हां तराना..।

पग आगे रखो.. धीमे, धीमे.. 
और आसाँ खुशी है
यदि चाहते हो,
पकड़ना 
इसे
पल याद कर लो, प्यार के..
पेंग के उस, जो नहीं तुम पा सके..

सांस हल्के हल्के लो तुम..
और भी आसान हैं
ये प्रसन्नता..
जब पुण्यशीला आदमी को 
सादगी को, शील 
उसका 
मृदुभाष को, हल्के सुनो
देखते ही मुदित हो..
कृतज्ञ हो उस परमतम को।

जय प्रकाश मिश्र

शब्द भावार्थ:

फटका चिरैया* एक अत्यंत छोटी चिड़ी जो बेहद स्मार्ट और सदा खुश रहती है।

चिंतन सूत्र: १ पतंजलि योगसूत्र 1.33

प्रमाण: योगसूत्र, समाधिपाद, सूत्र 1.33; सूत्र और भाष्य 

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणां 

सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां 

भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥

भावार्थ: सुखी व्यक्तियों के प्रति मैत्री, दुःखी के प्रति करुणा, पुण्यशील के प्रति प्रसन्नता और अपुण्य आचरण करने वालों के प्रति उपेक्षा की भावना विकसित करने से चित्त प्रसन्न और निर्मल होता है।

चिंतन सूत्र: २

स्रोत: वाजसनेयी संहिता, अध्याय 40, मंत्र 17; ईशावास्योपनिषद् 17 

मूल मंत्र

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।

ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥ १७॥

पदों का अर्थ

वायुः, अनिलम्, अमृतम् — प्राण का अमृत, सर्वव्यापक वायु-तत्त्व में प्रवेश; इसकी व्याख्या भाष्य के अनुसार समझनी चाहिए।

अथ इदं भस्मान्तं शरीरम् — अब यह शरीर भस्म होने वाला है।

क्रतो स्मर — हे क्रतो! स्मरण करो।

कृतं स्मर — किए हुए कर्मों का स्मरण करो।

आपकी इस रचना की सारांशिका में दोनों शास्त्रीय सूत्र एक ही जीवन-दृष्टि में जुड़ते हैं—चित्त को निर्मल रखकर ऐसा जीवन जीना, जिसका स्मरण अंत समय में भी सार्थक हो।

समालोचना व सारांशिका —

मन की प्रसन्नता बाहरी परिस्थितियों की देन मात्र नहीं; वह हमारे दृष्टिकोण और आचरण से भी उपजती है। सुखी के प्रति मैत्री, दुःखी के प्रति करुणा, पुण्यशील के प्रति प्रसन्नता और अनुचित आचरण करने वाले के प्रति विवेकपूर्ण उपेक्षा—ये भाव मन को ईर्ष्या, द्वेष और अनावश्यक अशान्ति से बचाते हैं। यही पतंजलि का चित्त-प्रसादन है।

और जब जीवन की संध्या में देह अपनी यात्रा पूरी करने लगे, तब *“ॐ क्रतो स्मर, कृतं स्मर”* का आह्वान हमें अपने किए हुए कर्मों की ओर लौटाता है।

इस प्रकार जीवन की सच्ची प्रसन्नता केवल खुश रहने में नहीं, बल्कि **दूसरों के सुख में प्रसन्न होने, दुःख में सहारा बनने और अपने कर्मों को स्मरण करने योग्य बनाने में है।** जो मन निर्मल रखता है और कर्मों को सार्थक बनाता है, उसके लिए प्रसन्नता कोई क्षणिक उपलब्धि नहीं—जीवन जीने की एक साधना बन जाती है।

Comments

Popular posts from this blog

एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!

रस्म थी, राग था, अनुराग था और समय सबके पास था