सीखता जब तक रहा

सीखता जब तक रहा 
बच्चा रहा मैं,
मुलायम
सा,
उत्स था
मेरी जिंदगी में..।

थकता नहीं था, 
बहता हुआ 
कुलकुल कुलकता 
झरता हुआ झरना था मैं।

आज भी जब सीखता हूँ! 
मन से कुछ,
एक 
उछल भीतर रेंगती है,
छुलुल छुलछुल...
मन मेरा संगीत में है डूब जाता
काम के..
तन भूल जाता 
कितने समय से नच रहा मैं।

मन लगे तो काम क्या है?
कुछ नहीं, 
आनंद 
है, 
अन्यथा यह जेल है
सबसे बड़ी..
देखा है मैने..लोगों को
मन मार कर बैठे हुए.. 
बिलबिलाते 
सीट पर
हां! 
काटते, काम में, 
यह जेल ही इस जिंदगी भर । 

जिन्दगी! क्या चीज़.. है,
बहने को कुछ इसे 
चाहिए..
आधार.. मीठा! 
मिश्री जैसा, प्यार सा 
जिस पर बहे..
काम का कोई धरातल हो, मन लगे।

मीत कोई,
स्वीट 
हो
या जगह सुंदर!
कलियों भरी, प्रिय महकती.. 
ठंडी ठंडी मन जंचे..।

पर क्यों है ये.. यह प्रश्न है, 
काम तो बस काम है
हर काम भी तो
जरूरी है,
हर
आदमी जंचता नहीं 
क्यों आदमी तो आदमी है,
कुछ तो है, वह.. तुझे प्रिय है
कुछ तो है यह.. मुझे प्रिय है..

जी... 
तलाश.. ही.., 
पूरक की अपने जिंदगी है, 
ऊब से हम निपट लें
भीतर की अपने
जीवन कला तो यही है।

जय प्रकाश मिश्र
 
सार-सारांशिका

सीखने की ललक मन को सदा युवा और जीवन को झरने-सा प्रवाहमान रखती है। जब काम में मन रम जाता है, तो श्रम भी आनंद बन जाता है; अन्यथा वही काम कारावास लगता है। प्रेम, रुचि, सुंदर परिवेश और अपने अनुकूल आधार की तलाश वस्तुतः मन के पूरक की तलाश है। जीवन-कला है—अपनी रुचि पहचानना, काम में आनंद खोजना और भीतर की ऊब को सृजन से जीतना।

📜 समभाव से मिलता श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक 47

> श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः     परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। 
 स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति   किल्बिषम्॥

भावार्थ: दूसरे के काम को अच्छी तरह करने से अपना स्वभावानुकूल कर्म करना श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करने में सहजता और सार्थकता है।

यह श्लोक अपनी कविता के उस भाव से जुड़ता है कि हर व्यक्ति और हर काम सबको समान रूप से प्रिय नहीं होता। अपने स्वभाव के अनुकूल कर्म में मन का रमना सहज है।




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