निकलता कांटा नहीं मैं क्या करूं।

शीर्षक: निकलता कांटा नहीं, मैं क्या करूं।

निकलता कांटा नहीं, अंदर कहीं 
समाज का इस,
मन.. में 
धंसा 
है, 
करकता है,
स्वांस संग हर कसक देता 
झेलना आसाँ नहीं है।

पीड़ा उसी की नेत्र से 
पहले बही थी,
शब्द 
बन बन 
लेखनी से वही है, जो लिख रही है।

निकल जाए.. जिस किस तरह!
उन आंसुओं संग 
चाहता था, 
चैन 
आए, थोड़ा जल्दी चाहता था।
 
निकला नहीं यह आज भी
इस चाह में 
शब्दों 
के इन जयमाल में, 
दिन रात इनको पिरोता हूँ।

पर सूक्ष्म है वह..
स्थूल है
यह दृष्टि मेरी, 
पुरानी, 
साफ दिखता कुछ नहीं है, 
धुंध है भीतर कहीं छंटती नहीं
मैं क्या करूं? 

अचानक है करक जाता,
और मैं, हूँ.. 
चिहुंक जाता,
सोचकर बेकार हूँ 
आवाज़ सुनकर हर किसी की 
दौड़ जाना चाहता हूँ, 
साथ सबके, 
जी नहीं, 
आगे रहा हूँ, 
संसार की इस दौड़ में 
अपनी उमर में
संसार में, जब तक रहा हूँ।

बिखर जाते, छिटके हुए, 
दाने सरीखे,
पारे हों जैसे.. अरमान मेरे,
भूमि पर भागते.. 
सब दूर तक 
जब
चाहता हूँ पकड़ना
इन्हे बटोरना 
इसी में तो देख न अब भी लगा हूँ..।

जानता हूँ.. उम्र में इस
चमकते भागते पारद कणों को
पकड़ पाऊँगा नहीं
संभव नहीं, 
अब
उठ  मैं जाऊं सलीके से,
पर मन है मेरे पास भी, 
मन का इस, मैं क्या करूं...?

भागता जग देखता हूँ 
ललचता हूँ,
आदमी हूँ, चाह! है
इन चाह को, बैठा हुआ
अब सोच! से निज
दबाता हूँ, कुचलता हूँ 
मारता.. हूँ, बूढ़ा हूँ 
मैं, 
पर... भागना 
साथ सबके चाहता हूँ,..
समय है, समय के फंदे पड़ा हूँ!

सच कह रहा हूँ, देखा है चिड़िया, 
पंख जिसके 
फंस गए हैं, चिपक कर
फंदे में फंस कर तड़फड़ाती
एक में वे सट गए हैं, 
मजबूर है वह, शांत है अब
तड़फड़ाती.. सामने
सच वही हूँ..! मैं..

यह अकन है, चिल्हकन है मेरी, 
आज भी जाती नहीं, 
हर आहटों पर, 
टंगी है,
यह करकती है,
निकलती क्यों कर नहीं हम

चाहता हूँ, जग सुलझ दूं 
और सुलझूं, शब्द से इन...
काँटा निकालूं, मन का अपने
कुछ कर के गुजरूं...
इस लिए मैं 
फूल सुंदर भेजता हूँ! नित्य ही..

निकला नहीं काँटा अभी
मन में धँसा है
अंदर कहीं 
एक कसक है
सहज है नहीं झेलना..

बिखर जाते पारे हों जैसे
अरमान मेरे
छिटके हुए दाने सरीखे
देखा है चिड़िया पंख जिसके
फंस गए हैं चिपक कर
सट गए हैं, एक में
मजबूर है और शांत है अब
तड़फड़ा कर, 
आज प्रिय, वही हूँ मैं।

जय प्रकाश मिश्र

मन का काँटा खून कम निकालता है,
शब्द अधिक निकालता है।
इसलिए कुछ लोग रोकर हल्के होते हैं,
और कुछ लोग लिखकर, 
नमस्कार।
जेपी.

सार-संपुटिका : निकलता काँटा नहीं, मैं क्या करूँ?

मन में समाज की पीड़ा का एक ऐसा सूक्ष्म काँटा धँसा है, जो दिखाई नहीं देता, पर हर आहट पर कसक उठता है। दूसरों के आँसू कभी अपने आँसू बने, फिर शब्द और कविता बनकर लेखनी से बहने लगे। लगा था, इस तरह पीड़ा हल्की होगी, मन को चैन मिलेगा; लेकिन वर्षों शब्दों के मोती पिरोने के बाद भी काँटा भीतर ही है।

उम्र के इस पड़ाव पर मन अब भी संसार की दौड़ में सबके साथ भागना, बिखरे अरमानों को समेटना और जग की उलझनें सुलझाना चाहता है; जबकि विवेक जानता है कि समय की अपनी सीमाएँ हैं। इच्छाओं को दबाने पर भी वे मरती नहीं, और दूसरों की पुकार पर दौड़ पड़ने की पुरानी बेचैनी भी जाती नहीं। फंदे में फँसी, पंख चिपक जाने से विवश चिड़िया में कवि अपनी ही छटपटाहट देखता है।

यही इस कविता का मूल द्वंद्व है—मन की करुणा और कर्म की आकांक्षा शेष है, पर समय और सामर्थ्य की सीमाएँ सामने हैं। कवि हारकर बैठना नहीं चाहता; वह अपने भीतर के काँटे को शब्दों से निकालने और संसार की पीड़ा को कुछ कम करने का प्रयत्न करता है। इसी प्रयत्न का सुंदर रूप है—प्रतिदिन लोगों को फूल भेजना, अर्थात् अपनी कसक के बीच भी दूसरों के जीवन में संवेदना, आशा और स्नेह बाँटना।

### सार-भाव

मन का काँटा केवल अपनी पीड़ा नहीं, दूसरों के दुःख से जुड़ी संवेदनशीलता का भी प्रतीक है। उसे निकालने की बेचैनी ही कविता को जन्म देती है; और शायद उसका पूरी तरह निकल न पाना ही कवि को निरंतर लिखते रहने की प्रेरणा देता है।

जीवन-संदेश: हर पीड़ा का समाधान हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन पीड़ा के रहते भी किसी दूसरे के जीवन में फूल खिलाना हमारे हाथ में हो सकता है। स्वयं पूरी तरह न सुलझ पाएँ, तब भी दूसरों के लिए थोड़ा उजाला बनना व्यर्थ नहीं है।

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