थकने नहीं देगी तुम्हे ।
थकने नहीं देगी तुम्हे ये भूख है,
तमन्ना, आशा है प्यारे!
आस.. है,
संसार
की,
रंगरूप की
स्वर्ण की चमचम चमकती
स्वर्ण की चमचम चमकती
रश्मियों की खींचतीं हैं चित्त तेरा
बांध लेती हैं तुझे
मनोहर प्रिय,
छुलछुल
छलकते रेशमी उन बंधनों में..
अत्यंत धीमे.. और धीमे..
और तूं.. फिर
तड़फड़ाता
अंत में,
एक
दिन कोने में मिलता
यहीं इस संसार में.. अकेले
एकांत में,
कुछ बुदबुदाता
बेकार था, यह खेल.. सारा!
जो नहीं
बंधते हैं इनमें, लुभावने,
चमचम चमकते बंधनों में,
उनके लिए, पिंजरा.. अलग है
पास उसके,
अस्तित्वनी वह! छद्मिनी वह!
शक्तिनी वह! ग़ज़ब है,
पाश है हाथों में उसके।
बांध लेती
ज्ञान के, बल बुद्धि के
विवेक के, तर्क के.. आयाम में..।
उलझा है लेती, विद्वान को
सन्यासियों को
पुस्तकों में,
मौन में, समाधि में।
फिर
झुलाती है
झूलना... यश कीर्ति का,
सम्मान का, नाम का
रिद्धि, सिद्धि का,
नजदीकियों का, अपने से
त्याज्य इस संसार में।
और एक दिन
पटक देती
खाट
पर..
उड़ा कर वहां उतने ऊँचे
बहुत नीचे!
बुदबुदाता मिला है यह जीव
मुझको
कहते हुए कुछ नहीं था..
खेल सारा..
शून्य से निकला हुआ, था शून्य सारा।
सच कह रहा हूँ
युगों से
युगों से
ऐसी ही है ये.. भूख अपनी...
हम मानवों की
सुलगती, सब भस्म करती..
समय की बहती नदी के पाट पर
आज भी वैसी की वैसी..
और हम हैं, सुखी होते, दुखी होते..
रेणुका की.. बन रही,
ढह रही,
प्रकृति की दीवार में।
सीमित हैं हम
परा के उस ज्ञान से..
बद्ध हैं जीव के ओढ़े हुए..
जीवतार सारे, प्यारे प्यारे बंधनों को।
जय प्रकाश मिश्र
नोट: यहां इस संदर्भ में आप पतञ्जलि योगसूत्र, समाधिपाद १.२४ सूत्र भी देख सकते हैं।
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः
पुरुषविशेष ईश्वरः॥ १.२४॥
पुरुषविशेषः —हमारी चेतन सत्ता का एक विशिष्ट स्वरूप है। यह विशिष्ट स्वरूप या पुरुष, हममे रहता है और सांसारिक बंधनों से सर्वथा असंपृक्त है। पर हम उसके साथ एक नहीं होते।
2. सरल भावार्थ
आप में स्थित पुरुष-विशेष ऐसा विशिष्ट चेतन पुरुष है, जो समस्त क्लेशों, कर्मों, कर्मों के फलों और कर्म-संस्कारों से सर्वथा अछूता है।
यहाँ पतञ्जलि सब में स्थित उस विशेष पुरुष को केवल शक्तिशाली या सृष्टि का नियंता कहकर परिभाषित नहीं करते, बल्कि यह बताते हैं कि वास्तविक चेतन सत्ता संसार के बंधनों से मुक्त है, जिनमें हम जीवभाव में बंधे रहते हैं।
सार-सारांशिका
मनुष्य की भूख केवल धन और संसार की चमक तक सीमित नहीं; वह ज्ञान, बुद्धि, विवेक, यश, सम्मान और सिद्धियों में भी नए बंधन खोज लेती है। तृप्ति की खोज में दौड़ता जीव अंततः समय के हाथों विवश होकर अपने खेल की निरर्थकता बुदबुदाता है। प्रश्न है—क्या इन सबके पार भी कोई ऐसा चेतन तत्त्व है, जो बंधनों से असंपृक्त है?
जेपी संग जीपीटी
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