आदमी है सबसे नीचे।
आसान हो या कठिन हो दुनियां ये क्यूं.. है इस तरह की, इतनें दिनों से, बुन रही कोई जाल है क्या, नटवरी! काम पर रखा हमे है, मुफ्त में.. इस जिंदगी भर, भोजनों पर कुछ भी न देगी, फल हमें और अंत में, एक दिन सब छीन लेगी बिन बताए.. भगा देगी इस जहां से.. नृशंसी! सोचता हूँ कौन है वह नित पट बदलती सामने मेरे स्वांग रचती, लुभा लेती आदमी को फांस लेती औरतों को किस तरह से एक साथ रखती, जिंदगी में जिंदगी से, बांध देती शरीरों को अपना बना लेती हमे, किन लालचों में बाँधकर, संतति हमारी प्राप्त करती उसी से, यह और आगे साथ रहती मौन यह बुद्धि दे, विवेक दे, शक्ति दे दे काम सारे कराती है इस जहां के.. और हम..सब, जानकार सब मूक हो.. बैल से भी और बदतर लगे रहते, नधे रहते, छोड़कर आराम हर। और सुख हैं मानते हम इसी को संतुष्ट हैं, बिन पगारों के.. खुश हैं रहते जाल में उस नटवरी के, देख कैसे, जिदगी भर। रूप रंग संवारती, चुपचा...