कैसे मिलूं साथी मैं उसको
निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं
समय की बहती नदी में,
डालता हूँ जाल
मन.. का,
ध्यान
के
उस भंवर में,
समर्पण से, भाव से,
साध लेकर, बैठता हूं,
सच कह रहा हूँ, आस लेकर
नित नई, आज वह मछली मिले..।
डूब जाता हूँ मैं गहरे
साथ साथी
उसी
के,
तली में तब तक हूं रहता
ढूंढता उसे.. दर बदर,
शाम तक
अंधेरा होने.. से पहले
निरखता हूं ध्यान में
छाया कहीं
उस
साक्षी की
एक तो मुझको मिले।
पानी में दोनों यहीं हैं, संसार में
पानी है उसमें और मुझमें
एक ही, पर फर्क है
विक्षुब्ध मैं
वह
शांत है..
कैसे मिलूं साथी मैं उसको
अंकुश धरूं, कैसे मैं मन पे?
भागता है, मछलियों सा
फुदकता है, गेंद सा
लौट आता, स्टिंग
जैसा..
डांट खाकर
बैठता है बिल्लियों सा
ताक में,
फिर भी लगा है
मुझमें अरे यह एक कोने..
क्या करूं, दुनियां है ये..
रंगीन कितनी,
लुभानी,
और मन मिट्टी है रे!
निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं
समय की बहती नदी में।
जय प्रकाश मिश्र
जी मित्र। यह कविता आपकी अंतर्यात्रा की बहुत स्वाभाविक अगली कड़ी लगती है। यहाँ आत्म-खोज कोई गंभीर, निर्जीव साधना नहीं रह जाती; आपने उसे मछली पकड़ने के रोजमर्रा के खेल में उतार दिया है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
भाव-गर्भित सारांशिका
कवि प्रतिदिन समय की बहती नदी में “सिकारा” लेकर उतरता है। उसका जाल बाहर की मछलियों के लिए नहीं, मन और ध्यान का जाल है; उसकी तलाश उस अदृश्य “मछली” की है जिसे वह साक्षी के रूप में पकड़ना चाहता है। वह नदी की तली तक उतरता है, दिन ढलने तक खोजता है, कभी उसकी छाया मिल जाने की आशा करता है।
धीरे-धीरे उसे अनुभव होता है कि जिसे खोज रहा है, वह बाहर नहीं है। पानी दोनों में एक है—संसार में भी और उसमें भी—पर अंतर इतना है कि वह स्वयं विक्षुब्ध है और वह साक्षी शांत। प्रश्न अब “वह कहाँ है?” का नहीं, “मैं अपने विक्षुब्ध मन को कैसे शांत करूँ?” का हो जाता है।
लेकिन मन साधक की आज्ञा में कहाँ रहता है! वह कभी मछली की तरह फुदकता है, गेंद की तरह उछलता है, लौट आता है, बिल्ली की तरह ताक लगाकर बैठ जाता है। और सामने संसार है—रंगीन, लुभावना, आकर्षक। इसलिए साधना कोई एक बार का समाधान नहीं; कवि रोज फिर उसी नदी में उतरता है।
यही अंतिम लौटना—
> “निकलता हूँ रोज लेकर सिकारा मैं
समय की बहती नदी में।”
कविता को पूर्ण वृत्त देता है। साक्षी मिल जाए या न मिले, खोज समाप्त नहीं होती।
कविता का सबसे गहरा भाव
मुझे यहाँ “मछली” को साक्षी का प्रतीक मानना अधिक सार्थक लगता है, लेकिन उसे पूरी तरह पकड़ लेना शायद कविता के विरुद्ध होगा। क्योंकि साक्षी वस्तु नहीं है जिसे जाल में बाँधा जा सके। कवि की साधना का paradox यही है—वह उसे पकड़ने निकलता है और धीरे-धीरे समझता है कि पकड़ने वाला ही पहले शांत होना चाहता है।
इसलिए—
> “विक्षुब्ध मैं
वह
शांत है..”
पूरी कविता का दार्शनिक केंद्र है।
और “मन मिट्टी है रे!” बहुत अच्छा लोक-स्पर्श देता है। इतने गंभीर आत्मचिंतन के बाद यह पंक्ति कविता को जमीन पर वापस ले आती है।
मित्रों को मोती
१.
जिसे तुम पकड़ना चाहते हो,
वह शायद पकड़ने की वस्तु नहीं—
तुम्हारे शांत होने की प्रतीक्षा है।
२.
मन को हराने मत बैठो;
उसे देखते रहो।
कभी-कभी साक्षी की पहली झलक वहीं मिलती है।
३.
साधना वह नहीं कि संसार रंगहीन हो जाए;
साधना यह है कि रंगों के बीच भी भीतर का जल शांत रहे।
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